विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
पृष्ठ 484, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 484
४७३
| श्लोकाः | अंशा० | अध्या० | श्लो० | श्लोकाः | अंशा० | अध्या० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| आस्फोटयामास तदा | ५ | ७ | १४ | इति विज्ञाप्यमानोऽपि | १ | १३ | २६ |
| आह चैनं कृतवर्मा | ४ | १३ | ८२ | इति श्रुत्वा स दैत्येन्द्रः | १ | १९ | १० |
| आह चैनामतिपापे | ४ | ७ | २५ | इति राजाह भरतः | २ | १३ | १० |
| आह च भगवान् | ४ | ३ | ६ | इति भरतनरेन्द्रसारवृत्तम् | २ | १६ | २५ |
| आह चोर्वशी | ४ | ६ | ६५ | इतीरितस्तेन स राजवर्यः | २ | १६ | २४ |
| आह च राजा | ४ | ६ | ७६ | इतीरितोऽसौ कमलोद्भवेन | ४ | १ | ९३ |
| आहारः फलमूलानि | १ | १३ | ८६ | इतः स्वर्गश्च मोक्षश्च | २ | ३ | ५ |
| आहुकस्य देवकोग्रसेनौ | ४ | १४ | १६ | इत्थमुन्मार्गयातेषु | ३ | १८ | ३३ |
| आह्लादकारिणः शुभ्राः | २ | ५ | ६ | इत्थं च पुत्रपौत्रेषु | ६ | ७ | १५ |
| इ० | इत्थं सञ्चिन्तयन्नेव | ६ | ६ | ३९ | |||
| इक्ष्वाकुतनयो यः | ४ | ५ | १ | इत्थं वदन्ययौ जिष्णुः | ५ | ३८ | ३४ |
| इक्ष्वाकुश्च नृगश्चैव | ३ | १ | ३३ | इत्थं विभूषितो रेमे | ५ | २५ | १८ |
| इक्ष्वाकुकुलाचार्यो वसिष्ठः | ४ | २ | १७ | इत्थं पुरस्त्रीलोकस्य | ५ | २० | ६३ |
| इक्ष्वाकुजह्नुमान्धातु० | ४ | २४ | १४१ | इत्थं पुमान्प्रधानं च | १ | २२ | ७५ |
| इक्ष्वाकूणामयं वंशः | ४ | २२ | १३ | इत्थं चिरगते तस्मिन् | २ | १३ | २८ |
| इच्छा श्रीभगवान्कामः | १ | ८ | २० | इत्थं विचिन्त्य बद्ध्वा च | ५ | ७ | ११ |
| इज्यते तत्र भगवान् | २ | ४ | १९ | इत्थं सञ्चिन्तयन्विष्णुम् | ५ | १७ | १८ |
| इतरस्यानुदिनम् | ४ | १३ | ५१ | इत्थं स्तुतस्तदा तेन | ५ | २४ | १ |
| इतरास्त्वब्रुवन्विप्र | ५ | ३८ | ७८ | इत्यनेकान्तवादं च | ३ | १८ | १२ |
| इति विविधमजस्य यस्य रूपम् | ६ | ८ | ६४ | इत्यन्ते वचसस्तेषाम् | १ | ९ | ६० |
| इति संसारदुःखार्क० | ६ | ५ | ५७ | इत्याज्ञाप्तास्ततस्तेन | ५ | ११ | ६ |
| इति कृत्वा मतिं कृष्णः | ५ | ११ | १६ | इत्याज्ञाप्तास्ततस्तेन | १ | १७ | ३२ |
| इति गोपकुमाराणाम् | ५ | ८ | ६ | इत्याकर्ण्य वचस्तस्य | २ | १५ | ३२ |
| इति गोपीवचः श्रुत्वा | ५ | ७ | ३३ | इत्याह भगवानौर्वः | ३ | १७ | १ |
| इति संस्मारितः कृष्णः | ५ | ७ | ४३ | इत्याकर्ण्य समस्तदेवैः | ४ | २ | ३० |
| इति संस्मारितो विप्र | ५ | ९ | ३४ | इत्यात्मानमात्मनैवाभिधाय | ४ | २ | १२९ |
| इति श्रुत्वा हरेर्वाक्यम् | ५ | १३ | १३ | इत्यात्मेर्ष्याकोपकलुषित० | ४ | १२ | ३० |
| इति सञ्चिन्त्य गोविन्दः | ५ | २३ | १३ | इत्याकर्ण्योपलब्धस्य | ४ | १३ | ४३ |
| इति श्रुत्वा स्मितं कृत्वा | ५ | २९ | १३ | इत्याकर्ण्य समुत्पाट्य | ५ | १ | ९ |
| इति तस्य वचः श्रुत्वा | ५ | १० | ४२ | इत्याकर्ण्य धरावाक्यम् | ५ | १ | २९ |
| इति नानाविधैर्भावैः | ५ | ६ | ४९ | इत्याज्ञाप्यासुरान्कंसः | ५ | ४ | १४ |
| इति कृत्वा मतिं सर्वे | ५ | ६ | २५ | इत्याश्वास्य विमुक्त्वा च | ५ | ४ | १७ |
| इतिहासपुराणे च | ५ | १ | ३८ | इत्यालोच्य स दुष्टात्मा | ५ | १५ | १२ |
| इति प्रसूतिं वृष्णीनाम् | ४ | १५ | ५० | इत्याज्ञप्तस्तदाक्रूरः | ५ | १५ | २३ |
| इति ऋषिवचनम् | ४ | २ | ८० | इत्यादिश्य स तौ मल्लौ | ५ | २० | २२ |
| इति मत्वा स्वदारेषु | ३ | ११ | १२७ | इत्युक्तोऽसौ तदा दैत्यैः | १ | १७ | २८ |
| इति निजभटशासनाय देवः | ३ | ७ | ३५ | इत्युक्तः स तया प्राह | १ | १५ | २५ |
| इति यमवचनं निशम्य पाशी | ३ | ७ | १९ | इत्युक्त्वा मन्त्रपूतैस्तैः | १ | १३ | २९ |
| इति शाखान्समाख्याताः | ३ | ६ | ३१ | इत्युक्ता देवदेवेन | १ | ९ | ८२ |
| इति पूर्वं वसिष्ठेन | १ | १ | २९ | इत्युक्त्या देवदेवेन | १ | १२ | ४० |
| इति सकलविभूत्यवाप्तिहेतुः | १ | ९ | १४९ | इत्युक्त्वा प्रययौ साथ | १ | १२ | २४ |