विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
पृष्ठ 493, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 493
४८२
| श्लोकाः | अंशा० | अध्या० | श्लो० | श्लोकाः | अंशा० | अध्या० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| कारूषा मालवाश्चैव | २ | ३ | १७ | किंकरैस्समुपानीतम् | ५ | ३१ | १४ |
| कार्त्तिक्यां पुष्करस्नाने | १ | २२ | ८९ | किञ्चित्परस्वं न हरेत् | ३ | १२ | ४ |
| कार्यकारयस्य यत्कार्यम् | १ | ९ | ४८ | किन्नरादन्तरिक्षस्तस्मात् | ४ | २२ | ५ |
| कालस्वरूपं विष्णोश्च | १ | ३ | ६ | किन्निमित्तमसौ शस्त्रैः | १ | १६ | ६ |
| कालस्तृतीयस्तस्यांशः | १ | २२ | २५ | किमनेनाल्पसारेण | ५ | १६ | ६ |
| कालनेमिर्हतो योऽसौ | ५ | १ | २३ | किमयं मानुषो भावो | ५ | ९ | २३ |
| कालस्वरूपी भगवान् | ५ | ३८ | ५८ | किमत्रानुष्ठेयमन्यथा | ४ | १३ | १४० |
| कालानलात्समुञ्जयः | ४ | १८ | ३ | किमर्थं मथितः पाणिः | १ | १३ | १० |
| कालियो दमितस्तोये | ५ | १३ | ४ | किमस्वाद्ध च मृष्टम् | २ | १५ | २७ |
| काले तत्रातिथिं प्राप्तम् | ३ | १५ | २३ | किमादित्यैः किं वसुभिः | ५ | ४ | ५ |
| कालेन गच्छता तौ तु | ५ | ६ | ३५ | किमिन्द्रेणाल्पवीर्येण | ५ | ४ | ४ |
| कालेन च कुमारम् | ४ | १२ | ३४ | किमिदं देवदेवेश | ५ | ७ | ३५ |
| कालेन गच्छता मित्रम् | १ | १२ | ८४ | किमिदमेकदैव | ४ | १३ | ११४ |
| कालेऽतीतेऽतिमहति | १ | १७ | २९ | किमेतदिति सिद्धानाम् | १ | ९ | १४ |
| कालेन न विना ब्रह्मा | १ | २२ | ३६ | किमुर्व्यामवनीपालाः | ५ | ४ | ८ |
| कालेन गच्छता सोऽथ | २ | १३ | ३१ | किरीटकुण्डलधरम् | ५ | ३४ | १८ |
| काले धनिष्ठा यदि नाम तस्मिन्... | ३ | १४ | १६ | किरीटहारकेयूर० | ६ | ७ | ८४ |
| कालेन गच्छता राजा | ३ | १८ | ६१ | किं करोमीति तान्सर्वान् | १ | १३ | ३५ |
| कालेन गच्छता तस्य | ४ | २ | ११२ | किं चापि बहुनोक्तेन | १ | १८ | २६ |
| कालेन गच्छता सौदासः | ४ | ४ | ४५ | किं चापि बहुनोक्तेन | १ | ८ | ३४ |
| कालो भवाय भूतानाम् | ५ | ३८ | ५५ | किं त्वेकं ममैतद्दुःख० | ४ | २ | १०७ |
| कालः क्रीडनकान्ते | १ | १२ | १८ | किं देवैः किं द्विजैर्वेदैः | ६ | १ | ५१ |
| कालः क्रीडनकानां यः | १ | १२ | १९ | किं देवैः किमनन्तेन | १ | १८ | १२ |
| काव्याशापाच्चाकालेनैव | ४ | १० | ७ | किं न पश्यसि दुग्धेन | ५ | २० | ५७ |
| काव्यालापांश्च ये केचित् | १ | २२ | ८५ | किं न दृष्टोऽमरपतिः | ५ | ४ | ६ |
| काशिराजबलं चैवम् | ५ | ३४ | २१ | किं न वेत्सि यथाऽहं च | ५ | ९ | २५ |
| काशिराजसुतेनेयम् | ५ | ३४ | ३५ | किं न वेत्ति नृशंसोऽयम् | ५ | १८ | २० |
| काशिराजश्च तामात्मजाम् | ४ | १३ | १२० | किं पुनर्यैस्तु संत्यक्ता | ३ | १८ | ९९ |
| काशिराजस्य विषये | ४ | १३ | ११६ | किं ममात्र विधेयमिति | ४ | २० | १८ |
| काशिराजगोत्रेऽवतीर्य | ४ | ८ | १० | किं वदामि स्तुतावस्य | १ | १२ | ४७ |
| काशिराजपत्नयाश्च | ४ | १३ | ११७ | किं वा सर्वजगत्स्रष्टः | १ | १२ | ६९ |
| काशी च भीमसेनात् | ४ | २० | ४६ | किं वृकैर्भक्षितो व्याघ्रैः | २ | १३ | २४ |
| काश्यपदुहिता सुमतिः | ४ | ४ | १ | किं श्रान्तोऽस्यल्पमध्वानम् | २ | १३ | ६१ |
| काश्यपतनयायास्तु | ४ | ४ | ६ | किं हेतुभिर्वदत्येषा | २ | १३ | ८८ |
| काश्यपः संहिताकर्ता | ३ | ६ | १८ | कीदृशं देवराज्यं ते | ५ | ३० | ७२ |
| काश्यस्य काशेयः | ४ | ८ | ७ | कीर्त्यते स्थिरकीर्तीनाम् | ४ | ६ | २ |
| काश्याकाशगुत्समद० | ४ | ८ | ५ | कुकुरभजमानशुचि० | ४ | १४ | १२ |
| काष्ठां गतो दक्षिणतः | २ | ८ | १० | कुकुराद्दधृष्टस्तस्माच्च | ४ | १४ | १३ |
| काष्ठाः पञ्चदशाख्याताः | १ | ३ | ८ | कुण्डिनं न प्रवेश्यामि | ५ | २६ | ९ |
| काष्ठा निमेषा दश पञ्च चैव | २ | ८ | ५९ | कुन्तेर्धृष्टिर्धृष्टेर्निधृतिः | ४ | १२ | ४१ |
| किंकराः पाशदण्डाश्च | ३ | ७ | ३८ | कुपितास्ते हरिं हन्तुम् | ५ | २६ | ८ |