विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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| श्लोकाः | अंशा० | अध्या० | श्लो० | श्लोकाः | अंशा० | अध्या० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्रसीद मद्धितार्थाय | ... २ | १५ | ३३ | प्रातर्निशि तथा सन्ध्या० | ... २ | ६ | ४१ |
| प्रसीदेश्वाकुकुलतिलक० | ... ४ | ४ | ६२ | प्रातश्चैवापराह्ने च | ... ५ | १ | ८५ |
| प्रसीद सीदतां दत्त: | ... ५ | २० | ९४ | प्रातस्त्वमागता भद्रे | ... १ | १५ | २८ |
| प्रसीद सर्वभूतात्मन् | ... ५ | २९ | २९ | प्रातर्गत्वातिदूरं च | ... २ | १३ | २१ |
| प्रसूतिं च ततः सृष्ट्वा | ... १ | ७ | ८ | प्राप्नोष्याराधिते विष्णौ | ... १ | ११ | ४९ |
| प्रसूत्यां च तथा दक्षः | ... १ | ७ | २२ | प्राप्तसमयश्च दक्षिणम् | ... ४ | २ | ५७ |
| प्रसूतिः प्रकृतेर्या तु | ... १ | ७ | ४४ | प्राप्नोषि यदि भर्तारम् | ... ५ | ३२ | २८ |
| प्रसेनजितो युवनाश्वोऽभवत् | ... ४ | २ | ४८ | प्रायश्चित्तान्यशेषाणि | ... २ | ६ | ३९ |
| प्रस्निग्धामलकेशश्च | ... ३ | १२ | ३ | प्रायश्चित्तेन महता | ... ३ | १८ | ४० |
| प्रहरन्ति महात्मानः | ... १ | १६ | १५ | प्रायशश्च हैहयताल० | ... ४ | ३ | ४१ |
| प्रहस्य तानाह नृपः | ... ६ | ६ | ४६ | प्रायश्चित्तमशेषेण | ... ६ | ६ | १९ |
| प्रहृष्टस्साध्विति प्राह | ... ६ | ७ | ८ | प्रायेणैते आत्मविद्या० | ... ४ | ५ | ३४ |
| प्रह्राद सर्वमेतत्ते | ... १ | २० | २५ | प्रारम्भाश्चावसीदन्ति | ... ६ | १ | ४७ |
| प्रह्राद सुप्रभावोऽसि | ... १ | १९ | २ | प्रावृट्काले च नभसि | ... ५ | १ | ७८ |
| प्रह्रादं सकलापत्सु | ... १ | २० | ३९ | प्रावृट्कालस्ततोऽतीव० | ... ५ | ६ | ३६ |
| प्रह्रादस्य तु दैत्यस्य | ... १ | २१ | १४ | प्रांशुमुत्तुंगवाहंसम् | ... ५ | १७ | २४ |
| प्राकृता वैकृताश्चैव | ... १ | ५ | २६ | प्रियव्रतो ददौ तेषाम् | ... २ | १ | ११ |
| प्राकृतो वैकृतश्चैव | ... १ | ५ | २५ | प्रियव्रतोत्तानपादौ | ... १ | ११ | १ |
| प्राक्सर्गदग्धानखिलान् | ... १ | ४ | ४८ | प्रियव्रतोत्तानपादौ | ... २ | १ | ३ |
| प्रागुत्तरे च दिग्भागे | ... ३ | ११ | ४७ | प्रियव्रतस्य नैवोक्ता | ... २ | १ | ४ |
| प्राग्ज्योतिषपुरस्यापि | ... ५ | २९ | १६ | प्रियमयुक्तं हितं नैतत् | ... ३ | १२ | ४४ |
| प्राग्द्रवं पुरुषोऽश्नीयात् | ... ३ | ११ | ८८ | प्रियाण्यनेकान्यवदन् | ... ५ | २४ | ११ |
| प्राङ्मुखाम्भोजयेद् विप्रान् | ... ३ | १५ | १७ | प्रीतिमांश्चाभवत्तस्मिन् | ... १ | २० | ३१ |
| प्राङ्मुखोदङ्मुखो वापि | ... ३ | ११ | ८० | प्रीतिः सस्त्रीकुमारस्य | ... ५ | १३ | ६ |
| प्राचीनबर्हिर्भगवान् | ... १ | १४ | ३ | प्रीत्यभिव्यञ्जितकरतलः | ... ४ | १३ | ५४ |
| प्राचीनाग्राः कुशास्तस्य | ... १ | १४ | ४ | प्रीत्यां पुलस्त्यभार्यायाम् | ... १ | १० | ९ |
| प्राच्यां दिशि शिरश्शस्तम् | ... ३ | ११ | ११३ | प्रेक्षतस्तस्य पार्थस्य | ... ५ | ३८ | २८ |
| प्राजापत्यं ब्राह्मणानाम् | ... १ | ६ | ३४ | प्रेतदेहं शुभैः स्नानैः | ... ३ | १३ | ८ |
| प्राजापत्येन वा सर्वम् | ... ३ | १० | ७ | प्रेते पितृत्वमापन्ने | ... ३ | १३ | ३७ |
| प्राणायामेन पवने | ... ६ | ७ | ४५ | प्रोक्तश्च देवैस्संसुप्तम् | ... ५ | २३ | २३ |
| प्राणाख्यमनिलं वश्यम् | ... ६ | ७ | ४० | प्रोक्तपर्वस्वशेषेषु | ... ३ | ११ | १२३ |
| प्राणायाम इवाम्भोभिः | ... ५ | १० | १५ | प्रोक्तान्येतानि भवता | ... ३ | २ | १ |
| प्राणाः फणेऽभवंश्चास्य | ... ५ | ७ | ४५ | प्रोच्यते परमेशो हि | ... १ | ९ | ४६ |
| प्राणयात्रानिमित्तं च | ... ३ | ९ | २९ | प्लक्षद्वीपप्रमाणेन | ... २ | ४ | २० |
| प्राणप्रदाता स पृथुः | ... १ | १३ | ८९ | प्लावयामास तां शून्याम् | ... ५ | ३८ | ९ |
| प्राणश्चैव मृकण्डुश्च | ... १ | १० | ४ | फ० | |||
| प्राणस्य द्युतिमान्पुत्रः | ... १ | १० | ५ | फणामणिसहस्रेण | ... २ | ५ | १५ |
| प्राणापानसमानानाम् | ... ३ | ११ | ९४ | फणासहस्रमालाढ्यम् | ... ५ | १८ | ३६ |
| प्रणिपत्य पितुः पादौ | ... १ | १९ | ३३ | फलगर्भा त्वमेवेज्या | ... ५ | २ | ९ |
| प्राणिनामुपकाराय | ... ३ | १२ | ४५ | फलानि पश्य तालानाम् | ... ५ | ८ | ५ |
| प्राणोऽन्तः सुषिराज्जातः | ... १ | १२ | ६३ | फलानां पततां शब्दम् | ... ५ | ८ | ७ |