विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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| श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० | श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| मृतस्य केशेषु तदा | ५ | २० | ८८ | य एते भवतोऽभिमता | ४ | १ | ७४ |
| मृतबन्धोर्दशाहानि | ३ | १३ | १८ | यक्षरक्षोरगैः सिद्धैः | ६ | ८ | २३ |
| मृतस्य च पुनर्जन्म | १ | १७ | ५८ | यक्षराक्षसदैतेय० | ५ | १ | १९ |
| मृताहनि च कर्तव्यम् | ३ | १३ | २३ | यक्षाणां च रथे भानोः | २ | ११ | ३ |
| मृताहनि च कर्तव्याः | ३ | १३ | ४० | यच्च मूर्त्तं हरे रूपम् | ६ | ७ | ७९ |
| मृतो नरकमभ्येति | ३ | ११ | १२६ | यच्च कार्यं तवास्माभिः | १ | ११ | ४० |
| मृदंगादिषु तूर्येषु | ५ | २० | ७२ | यच्चान्यदकरोत्कर्म | ५ | ३४ | २ |
| मृष्टं न मृष्टमप्येषा | २ | १५ | २६ | यच्चाहं भवता पृष्टः | ६ | २ | ४० |
| मृष्टं मदीयमान्नं ते | ५ | ३७ | ४२ | यच्चैतद्भवगतं मया तवोक्तम् | २ | १२ | ४७ |
| मेघपृष्ठे बलाकानाम् | ५ | ६ | ४१ | यजन्यज्ञान्यजत्येनम् | ३ | ८ | १० |
| मेघानां पयसां चेशः | ५ | १० | १९ | यजुर्वेदतरोश्शाखाः | ३ | ५ | १ |
| मेघेषु संगता वृष्टिः | २ | ८ | १०५ | यजूंष्यथ विसृष्टानि | ३ | ५ | १३ |
| मेधाविनो रिपुञ्जयस्ततः | ४ | २१ | १३ | यजूंषि त्रैष्टुभं छन्दः | १ | ५ | ५४ |
| मेधा श्रुतं क्रिया दण्डम् | १ | ७ | २९ | यजूंषि यैरधीतानि | ३ | ५ | २९ |
| मेधाग्निबाहुपुत्रास्तु | २ | १ | ९ | यज्ञसमाप्तौ भागग्रहणाय | ४ | ५ | १४ |
| मेरुरुल्बमभूत्तस्य | १ | २ | ५७ | यज्ञनिष्पत्तये सर्वम् | १ | ६ | ७ |
| मेरुपृष्ठे पतत्युच्चैः | २ | ८ | ११२ | यज्ञस्य दक्षिणायां तु | १ | ७ | २१ |
| मेरोश्चतुर्दिशं ये तु | २ | २ | ४६ | यज्ञविद्या महाविद्या | १ | ९ | १२० |
| मेरोरनन्तरांगेषु | २ | २ | ३० | यज्ञांगभूतं यद्रूपम् | ३ | १७ | २९ |
| मेरोश्चतुर्दिशं तत्तु | २ | २ | १६ | यज्ञेश्वरो हव्यसमस्तकव्य० | ३ | १५ | ३७ |
| मैत्रेयैतद्दलं तस्य | ५ | ३६ | १ | यज्ञेशाच्युत गोविन्द | २ | १३ | ९ |
| मैत्रेय श्रूयतां मत्तः | ६ | १ | ३ | यज्ञेन यज्ञपुरुषः | १ | १३ | १८ |
| मैत्रेय श्रूयतां कर्म | ५ | ३५ | ३ | यज्ञेषु यज्ञपुरुषः | ५ | १७ | ६ |
| मैत्रेय श्रूयतामयम् | ४ | १ | ३ | यज्ञे च मारीचमिषुवाताह तम् | ४ | ४ | ८९ |
| मैत्रेय श्रूयतामेतत् | ५ | १ | ४ | यज्ञैराप्यायिता देवाः | १ | ६ | ८ |
| मैत्रेय श्रूयतामेतत् | २ | ११ | ६ | यज्ञैर्यज्ञेश्वरो येषाम् | १ | १३ | १९ |
| मैत्रेय श्रूयतामेतत् | २ | २ | ४ | यज्ञैरनेकैर्देवत्वम् | ३ | १८ | २७ |
| मैत्रेय श्रूयतां सम्यक् | १ | १७ | १ | यज्ञैस्त्वमिज्यसेऽचिन्त्य० | ५ | २० | ९७ |
| मैत्रेय कारणं प्रोक्तम् | १ | २२ | ४४ | यज्ञैर्यज्ञविदो यजन्ति सततम् | ६ | ८ | ५८ |
| मैत्रेय कथयाम्येतत् | १ | ५ | ३ | यज्ञः पशुर्वह्निरशेषऋत्विक् | २ | १२ | ४६ |
| मैत्रेय पृथिवीगीतान् | ४ | २४ | १२७ | यज्ज्येष्ठशुक्लद्वादश्याम् | ६ | ८ | ३१ |
| मैत्र्यस्पृहा तथा तद्वत् | ३ | ८ | ३७ | यच्चभिर्यज्ञपुरुषः | ५ | १७ | १५ |
| मैथुनेनैव धर्मेण | १ | १५ | ८९ | यतश्च वृषभककुदि | ४ | २ | ३२ |
| मैवं भो रक्ष्यतामेष | १ | ५ | ४३ | यतश्चोशना ततः | ४ | ६ | १४ |
| मोक्षाश्रमं यश्चरते यथोक्तम् | ३ | ९ | ३३ | यतन्तो न विदुर्निंत्यम् | ५ | ७ | ५१ |
| मोहश्रमे शमं याते | ६ | ७ | २१ | यतिययातिसंयात्यायाति० | ४ | १० | १ |
| मोहिताश्चाभवंस्तत्र | ५ | ३ | १६ | यतिस्तु राज्यं नैच्छत् | ४ | १० | २ |
| म्रियमाणश्चासावति० | ४ | ४ | ४३ | यतो धर्मार्थकामाख्यम् | १ | १८ | २५ |
| म्लेच्छकोटिसहस्राणाम् | ५ | २३ | ७ | यतो भूतान्यशेषाणि | ३ | १७ | १२ |
| य० | यतो वृष्णिसंज्ञाम् | ४ | ११ | २८ | |||
| य इदं धर्मक्षेत्रम् | ४ | १९ | ७७ | यतो हि श्लोकाः | ४ | १५ | ४४ |
| य इदं जन्म वैन्यस्य | १ | १३ | ९४ | यतः काण्वायना द्विजाः | ४ | १९ | ३२ |