विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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| श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० | श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| यया शक्रप्रियार्थिन्या | १ | १५ | ४३ | यस्मिन्मन्वन्तरे व्यासाः | ३ | ३ | ८ |
| ययातिस्तु भूभृदभवत् | ४ | १० | ३ | यस्मिञ्जगद्धो जगदेतदाद्यः | ४ | १ | ९० |
| ययौ जडमतिः सोऽथ | २ | १३ | ५७ | यस्मिन् कृष्णे दिवं यातः | ४ | २४ | ११३ |
| यवनान्मुण्डितशिरसः | ४ | ३ | ४७ | यस्मिन्प्रतिष्ठितं सर्वम् | ५ | २० | १०२ |
| यवगोधूममुद्गादि० | २ | १५ | ३० | यस्मिन्दिने हरियातः | ५ | ३८ | ८ |
| यवाम्बुना च देवानाम् | ३ | १५ | २० | यस्मिन्ननन्ते सकलम् | १ | १४ | ३६ |
| यवाः प्रियंगवो मुद्गाः | ३ | १६ | ६ | यस्मै यस्मै स्तनं रात्रौ | ५ | ५ | ८ |
| यशोदा शकटारूढ० | ५ | ६ | ७ | यस्य सञ्जातकोपस्य | १ | ९ | १७ |
| यशोदाशयने मां तु | ५ | १ | ७९ | यस्य नागवधूहस्तैः | २ | ५ | २५ |
| यश्च सायं तथा प्रातः | १ | ९ | १३९ | यस्य नादेन दैत्यानाम् | ५ | २१ | २९ |
| यश्चतुर्विंशतिं प्राच्य० | ४ | १९ | ५२ | यस्य दशरथो मित्रम् | ४ | १८ | १७ |
| यश्च पञ्चाशीतिवर्ष० | ४ | ११ | २० | यस्य प्रसादादहमच्युतस्य | ४ | १ | ८५ |
| यश्च भगवता सकल० | ४ | १४ | ४७ | यस्य रागादिदोषेण | ३ | ८ | १८ |
| यश्चैतच्चरितं तस्य | ५ | ३८ | ९४ | यस्य संशोषको वायुः | १ | १५ | १५० |
| यश्चैतत्सौभरिचरितम् | ४ | २ | १३३ | यस्य क्षेत्रे दीर्घतम० | ४ | १८ | १३ |
| यश्चैतच्छृणुयाज्जन्म | १ | ९ | १४६ | यस्य चोत्पादिता कृत्या | १ | १५ | १५२ |
| यश्चैतत्कीर्तयेन्नित्यम् | १ | १२ | १०२ | यस्य प्रभावाद्भीष्माद्यैः | ५ | ३८ | ४९ |
| यश्चैतच्चरितं तस्य | ५ | ३८ | ९४ | यस्यावताररूपाणि | ५ | ७ | ६७ |
| यश्शुकदुहितरं कीर्तिम् | ४ | १९ | ४४ | यस्यावलोकनादस्मान् | ५ | ३८ | ४६ |
| यष्टिहस्तानवेक्ष्यास्मान् | ५ | ३८ | १७ | यस्याखिलमहीव्योम० | ५ | ७ | ५० |
| यस्तमांक्ष्यति तीव्रात्मा | १ | १४ | २७ | यस्यायुतायुतांशांशे | १ | ९ | ५३ |
| यस्तु सम्यक्करोत्येवम् | ३ | ९ | १७ | यस्यान्तः सर्वमेवेदम् | १ | ११ | ४५ |
| यस्तु सन्त्यज्य गार्हस्थ्यम् | ३ | १८ | ३८ | यस्याजपुत्रो दशरथः | ४ | १८ | १८ |
| यस्ते जनिष्यते | ४ | १२ | ३१ | यस्याहः प्रथमं रूपम् | १ | १४ | २५ |
| यस्ते नापहतः पूर्वम् | ५ | २७ | २ | यस्यावताररूपाणि | १ | १९ | ८० |
| यस्त्वेतत्सकलं शृणोति पुरुषः | ६ | ८ | ५५ | यस्यामिष्ट्वा महायज्ञैः | २ | ८ | १२० |
| यस्त्वेतच्चरितं तस्य | १ | २० | ३६ | यस्याश्च रोमशे जङ्घे | ३ | १० | २० |
| यस्त्वेतां नियतश्चर्याम् | ३ | ९ | २३ | यस्यैषा सकला पृथ्वी | २ | ५ | २२ |
| यस्मान्मामसम्भाष्य | ४ | ५ | १० | यस्सृज्यते सर्गकृदात्मनैव | ४ | १ | ८९ |
| यस्माद्विष्टमिदं विश्वम् | ३ | १ | ४५ | याचिता तेन तन्वंगी | १ | ९ | ५ |
| यस्मादभोज्यम् | ४ | ४ | ५३ | याज्ञवल्क्योऽपि मैत्रेय | ३ | ५ | १५ |
| यस्मादेवं मय्यतृप्तायाम् | ४ | ४ | ६५ | याज्ञवल्क्यस्तु तत्राभूत्० | ३ | ५ | ३ |
| यस्माद्ब्रह्मा च रुद्रश्च | ५ | ७ | ६३ | याज्ञवल्क्यस्ततः प्राह | ३ | ५ | ११ |
| यस्मात्तवैष दुष्टात्मा | ५ | १६ | २३ | याज्ञवल्क्यस्तदा प्राह | ३ | ५ | २७ |
| यस्माज्जगत्सकलमेतदनादिमध्यात् | ५ | ३० | ७९ | यातनाभ्यः परिभ्रष्टाः | ३ | ७ | ६ |
| यस्माद्विकृतरूपं माम् | ५ | ३८ | ८१ | यात देवा यथाकामम् | १ | १२ | ३९ |
| यस्मादवाग्व्यवर्तन्त | १ | ५ | १७ | यातीतिगोचरा वाचाम् | १ | १९ | ७७ |
| यस्मिन्प्रतिष्ठितो भास्वान् | २ | ८ | १०४ | यादवाश्च यदुनामोप० | ४ | ११ | ३० |
| यस्मिन्नाराधिते सर्वम् | १ | १४ | १७ | या दुस्त्यजा दुर्मतिभिः | ४ | १० | २६ |
| यस्मिन्यस्तमतिर्न याति नरकम् | ६ | ८ | ५७ | या नाग्निना न चार्केण | १ | १७ | ८६ |
| यस्मिन्यस्मिन्मुगे व्यासः | ३ | ३ | ३ | यानि मूर्तान्यमूर्तानि | १ | २२ | ८६ |