भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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पृष्ठ 70

अ० १३ ] * प्रथम अंश * ५९

श्रीमैत्रेय उवाच किमर्थं मथितः पाणिर्वेनस्य परमर्षिभिः। यत्र जज्ञे महावीर्यः स पृथुर्मुविसत्तम ॥ १० श्रीपराशर उवाच सुनीथा नाम या कन्या मृत्योः प्रथमतॊऽभवत्। अङ्गस्य भार्या सा दत्ता तस्यां वेनो व्यजायत ॥ ११ स मातामहदोषेण तेन मृत्योः सुतात्मजः। निसर्गादेव मैत्रेय दुष्ट एव व्यजायत ॥ १२ अभिषिक्तो यदा राज्ये स वेनः परमर्षिभिः। घोषयामास स तदा पृथिव्यां पृथिवीपतिः ॥ १३ न यष्टव्यं न दातव्यं न होतव्यं कथञ्चन। भोक्ता यज्ञस्य कस्त्वन्यो ह्यहं यज्ञपतिः प्रभुः ॥ १४ ततस्तमृषयः पूर्वं सम्पूज्य पृथिवीपतिम्। ऊचुः सामकलं वाक्यं मैत्रेय समुपस्थिताः ॥ १५ ऋषय ऊचुः भो भो राजन् शृणुष्व त्वं यद्वदाम महीपते। राज्यदेहोपकाराय प्रजानां च हितं परम् ॥ १६ दीर्घसत्रेण देवेशं सर्वयज्ञेश्वरं हरिम्। पूजयिष्याम भद्रं ते तस्यांशस्ते भविष्यति ॥ १७ यज्ञेन यज्ञपुरुषो विष्णुः सम्प्रीणितो नृप। अस्माभिर्भवतः कामान्सर्वानेव प्रदास्यति ॥ १८ यज्ञैर्यज्ञेश्वरो येषां राष्ट्रे सम्पूज्यते हरिः। तेषां सर्वेप्सितावाप्तिं ददाति नृप भूभृताम् ॥ १९ वेन उवाच मत्तः कोऽभ्यधिकोऽन्योऽस्ति कश्चाराध्यो ममापरः। कोऽयं हरिरिति ख्यातो यो वो यज्ञेश्वरो मतः ॥ २० ब्रह्मा जनार्दनः शम्भुरिन्द्रो वायुर्यमो रविः। हुतभुग्वरुणो धाता पूषा भूमिर्निशाकरः ॥ २१ एते चान्ये च ये देवाः शापानुग्रहकारिणः। नृपस्यैते शरीरस्थाः सर्वदेवमयो नृपः ॥ २२ एवं ज्ञात्वा मयाज्ञप्तं यद्यथा क्रियतां तथा। न दातव्यं न यष्टव्यं न होतव्यं च भो द्विजाः ॥ २३ भर्तृशुश्रूषणं धर्मो यथा स्त्रीणां परो मतः। ममाज्ञापालनं धर्मो भवतां च तथा द्विजाः ॥ २४

श्रीमैत्रेयजी बोले—हे मुनिश्रेष्ठ! परमर्षियोंने वेनके हाथको क्यों मथा जिससे महापराक्रमी पृथुका जन्म हुआ ? ॥ १०॥ श्रीपराशरजी बोले—हे मुने! मृत्युकी सुनीथा नामवाली जो प्रथम पुत्री थी वह अंगको पत्नीरूपसे दी (व्याही) गयी थी। उसीसे वेनका जन्म हुआ ॥ ११ ॥ हे मैत्रेय! वह मृत्युकी कन्याका पुत्र अपने मातामह (नाना)-के दोषसे स्वभावसे ही दुष्ट प्रकृति हुआ ॥ १२ ॥ उस वेनका जिस समय महर्षियोंद्वारा राजपद्पर अभिषेक हुआ उसी समय उस पृथिवीपतिने संसारभरमें यह घोषणा कर दी कि 'भगवान्, यज्ञपुरुष मैं ही हूँ, मुझसे अतिरिक्त यज्ञका भोक्ता और स्वामी हो ही कौन सकता है? इसलिये कभी कोई यज्ञ, दान और हवन आदि न करे' ॥ १३-१४ ॥ हे मैत्रेय! तब ऋषियोंने उस पृथिवीपतिके पास उपस्थित हो पहले उसकी खूब प्रशंसा कर सान्त्वनायुक्त मधुर वाणीसे कहा ॥ १५ ॥ ऋषिगण बोले—हे राजन्! हे पृथिवीपते! तुम्हारे राज्य और देहके उपकार तथा प्रजाके हितके लिये हम जो बात कहते हैं, सुनो ॥ १६॥ तुम्हारा कल्याण हो; देखो, हम बड़े-बड़े यज्ञोंद्वारा जो सर्व-यज्ञेश्वर देवाधिपति भगवान् हरिका पूजन करेंगे उसके फलमेंसे तुमको भी [छठा] भाग मिलेगा ॥ १७ ॥ हे नृप! इस प्रकार यज्ञोंके द्वारा यज्ञपुरुष भगवान् विष्णु प्रसन्न होकर हमलोगोंके साथ तुम्हारी भी सकल कामनाएँ पूर्ण करेंगे ॥ १८ ॥ हे राजन् जिन राजाओंके राज्यमें यज्ञेश्वर भगवान् हरिका यज्ञोंद्वारा पूजन किया जाता है, वे उनकी सभी कामनाओंको पूर्ण कर देते हैं ॥ १९॥ वेन बोला—मुझसे भी बढ़कर ऐसा और कौन है जो मेरा भी पूजनीय है? जिसे तुम यज्ञेश्वर मानते हो वह 'हरि' कहलानेवाला कौन है? ॥ २०॥ ब्रह्मा, विष्णु, महादेव, इन्द्र, वायु, यम, सूर्य, अग्नि, वरुण, धाता, पूषा, पृथिवी और चन्द्रमा तथा इनके अतिरिक्त और भी जितने देवता शाप और कृपा करनेमें समर्थ हैं वे सभी राजाके शरीरमें निवास करते हैं, इस प्रकार राजा सर्वदेवमय है ॥ २१-२२ ॥ हे ब्राह्मणो ! ऐसा जानकर मैंने जैसी जो कुछ आज्ञा की है वैसा ही करो। देखो, कोई भी दान, यज्ञ और हवन आदि न करे ॥ २३ ॥ हे द्विजगण! स्त्रीका परमधर्म जैसे अपने पतिकी सेवा करना ही माना गया है वैसे ही आपलोगोंका धर्म भी मेरी आज्ञाका पालन करना ही है ॥ २४ ॥