विष्णुधर्मोत्तर पुराण (तृतीय खण्ड - चित्रसूत्र, वास्तु, शिल्प व प्रतिमा लक्षण)

विष्णुधर्मोत्तर पुराण (तृतीय खण्ड - चित्रसूत्र, वास्तु, शिल्प व प्रतिमा लक्षण)
Vishnudharmottara Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (सम्पादक: डॉ. प्रियबाला शाह) द्वारा
स्रोत: Sri Vishnu Dharmottara Mahapuranam 1000p Classic Edition (उद्गम)
DevanagariHindipublished1,001 पृष्ठ
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| वि० ध० | अनु० |
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| अध्यायाः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः |
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| ४८ | आजौ सकृत्कृपापातेन रामेणासंख्यशाल्यवचव्यूहननम् .... | २८ | १ |
| ४९ | परशुरामकृतसाल्ववधदृष्टमद्भुतमुखदेवानां रणभूमावागत्य परशुरामकर्मप्रशंसनं शंकरेण तत्रागतसमसर्जनपूर्वमद्भुतमाश्रमागमन्य प्रदर्शनमार्तं हत्वा परशोः पुनस्तद्धस्तगमनञ्च | ” | २ |
| ५० | ब्राह्मणेभ्यश्चतुर्दिग्व्याप्रामृषभदानपुरस्सरं शंकरेण रामाय समयोगरहस्य-संहारमन्त्रककवित्वरणम् .... | २९ | १ |
| ५१ | सर्वदेववरिष्ठोऽपि भवांश्चेत्तसि कं स्मरतीति शंकरं प्रति परशुरामप्रश्नः | ” | २ |
| ॥ अथ शंकरगीता ॥ | |||
| ५२ | शंकरगीतासु ध्येयनिर्देशः .... | ” | ” |
| ५३ | प्रजापतिः कश्यपस्यादितिदित्योर्भार्ययोः शक्रो हिरण्याक्षपुत्रयोः स्वर्ग-पातालराज्ये प्रदत्तवान्, एकदा गिरिपूतपातिषु धाराचलनात्पातालेऽवेध-जलमग्ने देवकृतोपद्रवं शंक्रमानो हिरण्याक्षः शक्रं विजित्य स्वाराज्यं लेभे, हतस्वगोत्रदशप्रार्थनया विष्णुर्नवराहवपुरानेकदित्यसहिताहिरण्याक्षं हत्वा शक्राथ तल्लोकमापितवान् स च पर्वतपाश्र्वशक्तं .... | ३० | १ |
| ५४ | महाप्रतावस्तुष्टप्रजापतिना हिरण्यकशिपवे दत्तनिखिलनराघवश्यवरे दूते तद्वधस्याभवत्किकंतेदश्वप्रार्थनया विष्णोस्तस्य वधे च सूचिते देवपीडादन्ते नृसिंहवपुषा विष्णुना तद्वधः .... | ३१ | १ |
| ५५ | बलिनिप्रतपसा प्रजापतेः सुरासुरावध्यत्ववरे लब्धे, प्राप्ताभात्रे दैत्य-राजतार्यो स्वर्गादिन्द्रप्रभृतिदेवनिस्सारणम्, शुक्रेण कश्यपब्रह्मभ्यां सह विष्णवे स्वदुःखं निवेद्य वामनरूपिणा तेन बलिमखे त्रिपाद्भूमिमाच्या सुरेन्द्रवन्तं पादद्वयभूमिलाभादवशिष्टभूमेर्भावादछल्ये | ||
| सुतले स्थानदानं द्वितिये मन्वन्तरे शक्रत्वप्राप्तिं सदा च सुतले स्वसन्निधानातीदवरानददात् .... | ३२ | २ | |
| ५६ | विष्णोर्दिष्यविभूतिवर्णनम् .... | ३३ | २ |
| ५७ | विष्णवाराधनतत्सकलशार्थसाधनम् .... | ३४ | २ |
| ५८ | केशवादिकृतिकरानाम्कथनम् .... | ३५ | २ |
| ५९ | वारणशक्तीतिथ्युपवासकरणफलम् .... | ” | ” |
| ६० | श्रवणद्वादशीव्यहषृक्तिथिकहापूर्णा सीषूपवासादानादिकफलम् .... | ३६ | २ |
| ६१ | प्रातःकालिक (अभिगम) पूजायामितिकर्तव्यता .... | ३७ | १ |
| ६२ | उपादानविधिः .... | ” | ” |
| ६३ | इज्यासयमयविधिआत्नामशृपकोदीनां निर्वचनम् .... | ३८ | २ |
| ६४ | स्वाध्यायकालानुकीर्तनम् .... | ३९ | १ |
| ६५ | स्वस्तिकाथातासनवचनस्थूलयत्थाविराचिन्तनपुरस्सरं भूम्यादिपञ्चभूत-मनोबुद्धयात्मात्मकपुरुषभोगादिकथनम् .... | ३९ | २ |
| ॥ इति शङ्करगीता ॥ | |||
| ६६ | शक्रप्रार्थनया शंकरंण पातालस्थनवव्येवश्वातृतनतार्थं वैष्णवयुग्म-यतायकणृपवित्रणपुरस्सरसुमरजयनानन्तरदाशीरिणमहेतीरागम्याय तदुपोपौपदश्व .... | ४० | १ |