विष्णुधर्मोत्तर पुराण (तृतीय खण्ड - चित्रसूत्र, वास्तु, शिल्प व प्रतिमा लक्षण)

विष्णुधर्मोत्तर पुराण (तृतीय खण्ड - चित्रसूत्र, वास्तु, शिल्प व प्रतिमा लक्षण)
Vishnudharmottara Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (सम्पादक: डॉ. प्रियबाला शाह) द्वारा
स्रोत: Sri Vishnu Dharmottara Mahapuranam 1000p Classic Edition (उद्गम)
DevanagariHindipublished1,001 पृष्ठ
पृष्ठ 16, कुल 1001 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 16
| अध्यायाः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः | अध्यायाः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ८३ | सर्वदेवताऽऽह्वानमग्निसहनक्षत्रतिथिकरणानि, करणानयनप्रकारविधिं होराकुलिकार्द्धवेलासमुहूर्ततत्समितिवर्णनं यथासमयकृताचौराद्याः फलाधिक्यञ्च .... | ५० | १ | ९५ | ध्रुवस्थानशान्तन्नमहनक्षत्राद्यावाहनम् .... | ५९ | १ |
| ८४ | लग्नतद्द्वादशहोरेक्षणानवराशस्त्रीशत्रिशिकथन्म् .... | ५१ | २ | ९६ | तत्तद्देवताकुलेपनवर्णनम् .... | ६१ | १ |
| ८५ | ग्रहनक्षत्रादिशराङ्गुमाणराशीशुभपरिक्षानम् .... | ५२ | १ | ९७ | ग्रहक्षेत्रेष्ववतादीनां तत्तद्वर्णवस्त्रपताकापुष्परत्नधूपदीपादिदानम् .... | ६२ | १ |
| ८६ | पीडितग्रहनक्षत्राणां तत्तदिष्टपीडाकारत्वं युद्धे विध्वस्तपराजितनचित्पितृगृहस्थानामपि स्वस्वदिक्पीडनम् .... | ५३ | २ | ९८ | तत्तद्देवानां तत्तद्द्रव्यधूपदीपादि .... | ” | ” |
| ८७ | जन्माद्यश्विनीचन्द्रादिनक्षत्रषट्त्रिंशतादिषुशुभाशुभकथनम् .... | ” | २ | ९९ | ध्रुवस्थाननिर्वित्खेटानां नेवेद्यद्यार्थाः .... | ” | ” |
| ८८ | अश्विय्यादिनक्षत्रातारासंख्याग्रहणनक्षत्रमण्डलादिवर्णनम् .... | ५४ | १ | १०० | तथा पानपदार्थाः .... | ६३ | १ |
| ८९ | जन्मकर्मसांघातिकातिसाहुदायिकाभिषेकार्कसंर्दकनक्षत्रेषु पीडितेषु गोमूत्राद्यभिषेकपुरस्सरं तत्तद्गृहपूनादि .... | ” | २ | १०१ | तत्तद्देवताहोमपदार्थकथनम् .... | ” | ” |
| ९० | ग्रहशृङ्गपीडाविधवर्णनम् .... | ५५ | १ | १०२ | द्वादशद्वादशमहाग्रहाणां होममन्त्राः .... | ६४ | १ |
| ९१ | तत्तद्ग्रहैर्ग्रहक्षतानांविधिवर्णनम् .... | ” | ” | १०३ | तत्तद्देवतादाक्षिणांनिर्देशः .... | ” | ” |
| ९२ | मृत्युञ्चादेवनिर्मितसंस्काराधिकार्यं मातुकथनपुरस्सरं होमते महाकल्पादिवर्य्यधिपतीनां वैदिकमन्त्रैर्हवनकर्मतसातिरूपेोत्तरतन्त्रकथनम् .... | ” | २ | १०४ | शान्त्यवसाने याजककर्तृकयजमानकर्त्रे तमिरवन्थनमाशीर्वादश्च .... | ६७ | १ |
| ९३ | पश्चात्येन मण्डलशौचादि विधाय जीवावाहनहृदूर्जादिककथम् | ५७ | ० | १०५ | ग्रहशान्तिफलमभिधानम् .... | ” | ” |
| ९४ | संख्यह्यनेनं मण्डलोविधिं विधाय मध्ये सध्रुवकोष्ठिकद्वादशकोष्ठमणे प्राच्यादितो मेषादिकल्पत्वाऽऽकादावद्दिभागादिमण्डलेषु तत्तद्देवतामण्डलेषु च तत्तन्न्यासकरणम् .... | ५८ | १ | १०६ | ग्रहक्षेत्रमीपूतध्रुवा स्थितचतुर्दशतारागानामनिर्देशपूर्वकं शिशुमारचक्रनिबद्धतारकाज्ञानतद्दर्शनादिमाहात्म्यकथनम्, ओर्त्तानपादिध्रुवस्य विष्णुरूपता तन्निबद्धमञ्जूज्योतिर्गणस्य भ्रमणम्, तदयः क्रमणसत्तापमण्डल-भवन-शनैश्वर-कुज-सूर्य-शुक्र-बुध-चन्द्राणां-स्थितिः, प्रादक्षिण्यगतिज्योतिश्चक्रं । नवग्रहाणाञ्जन्मवृक्षम्, तत्र सूर्येतजोऽहम्मानायाः संज्ञाया मत्युमयसुतोपत्युच्छडापाताः सावर्णज्ञानैरोषतोपत्ति, उत्तरकुरुषु वडवारूप चन्सयाः संज्ञाया खे. सक्ताशाडाश्विनेयन्योस्ततोपत्ति, रैवन्तपूज्याऽऽउश्मपतकथञ्चै .... | ६८ | १ |