विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)
Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 104, कुल 153 में से
संदर्भ में पढ़ेंआत्म-दृष्टि १०७ तरङ्गफेनभ्रमबुद्बुदादि सर्वं स्वरूपेण जलं यथा तथा। चिदेव देहाद्यहमन्तमेतत् सर्वं चिदेवैकरसं विशुद्धम्॥ ३९१॥ जैसे तरंग, फेन, भँवर और बुद्बुद आदि स्वरूपसे सब जल ही हैं, वैसे ही देहसे लेकर अहंकारपर्यन्त यह सारा विश्व भी अखण्ड शुद्धचैतन्य आत्मा ही है। सदेवेदं सर्वं जगदवगतं वाङ्मनसयोः सतोऽन्यन्नास्त्येव प्रकृतिपरसीम्नि स्थितवतः। पृथक् किं मृत्स्नायाः कलशघटकुम्भाद्यवगतं वदत्येष भ्रान्तस्त्वमहमिति मायामदिरया॥ ३९२॥ मन और वाणीसे प्रतीत होनेवाला यह सारा जगत् सत्स्वरूप ही है; जो महापुरुष प्रकृतिसे परे आत्मस्वरूपमें स्थित है, उसकी दृष्टिमें सत्से पृथक् और कुछ भी नहीं है। मिट्टीसे पृथक् घट, कलश और कुम्भ आदि क्या हैं? मनुष्य मायामयी मदिरासे उन्मत्त होकर ही 'मैं, तू'—ऐसी भेदबुद्धियुक्त वाणी बोलता है। क्रियासमभिहारेण यत्र नान्यदिति श्रुतिः। ब्रवीति द्वैतराहित्यं मिथ्याध्यासनिवृत्तये॥ ३९३॥ कार्यरूप द्वैतका उपसंहार करते हुए 'जहाँ और कुछ नहीं देखता' ऐसी अद्वैतपरक श्रुति* मिथ्या अध्यासकी निवृत्तिके लिये बारम्बार द्वैतका अभाव बतलाती है। आकाशवन्निर्मलनिर्विकल्प- निःसीमनिष्यन्दननिर्विकारम् । अन्तर्बहिःशून्यमनन्यमद्वयं स्वयं परं ब्रह्म किमस्ति बोध्यम्॥ ३९४॥
- 'यत्र नान्यत् पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमा' (छान्दो० ७। २४। १)