भारतकोश
विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)

विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)

Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished153 पृष्ठ

पृष्ठ 116, कुल 153 में से

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प्रारब्ध-विचार १११ प्रवृत्ति रह सकती है, तो ऐसी बात नहीं है क्योंकि ब्रह्मके एकत्वज्ञानसे [ विषयका बाध हो जानेके कारण ] इसकी वासना मन्द हो जाती है। अत्यन्तकामुकस्यापि वृत्तिः कुण्ठति मातरि। तथैव ब्रह्मणि ज्ञाते पूर्णानन्दे मनीषिणः ॥ ४४५ ॥ जिस प्रकार अत्यन्त कामी पुरुषकी भी कामवृत्ति माताको देखकर कुण्ठित हो जाती है, उसी प्रकार पूर्णानन्दस्वरूप ब्रह्मको जान लेनेपर विद्वान्‌की संसारमें प्रवृत्ति नहीं होती। प्रारब्ध-विचार निदिध्यासनशीलस्य बाह्यप्रत्यय ईक्ष्यते। ब्रवीति श्रुतिरेतस्य प्रारब्धं फलदर्शनात् ॥ ४४६ ॥ निदिध्यासनशील (आत्मचिन्तनमें लगे हुए) पुरुषको बाह्य पदार्थोंकी प्रतीति होती देखी जाती है, फल-भोग देखा जानेके कारण श्रुति उसे उसका प्रारब्ध बतलाती है। सुखाद्यनुभवो यावत्तावत्प्रारब्धमिष्यते । फलोदयः क्रियापूर्वो निष्क्रियो न हि कुत्रचित् ॥ ४४७॥ [ युक्तिसे भी ] जबतक सुख-दुःख आदिका अनुभव है तबतक प्रारब्ध माना जाता है, क्योंकि फलका भोग क्रियापूर्वक होता है, बिना कर्मके कहीं नहीं होता। अहं ब्रह्मेति विज्ञानात्कल्पकोटिशतार्जितम् । सञ्चितं विलयं याति प्रबोधात्स्वप्नकर्मवत् ॥ ४४८ ॥ जग जानेपर जैसे स्वप्नावस्थाके कर्म लीन हो जाते हैं वैसे ही 'मैं ब्रह्म हूँ' ऐसा ज्ञान होते ही करोड़ों कल्पोंके संचित कर्म नष्ट हो जाते हैं। यत्कृतं स्वप्नवेलायां पुण्यं वा पापमुल्बणम् । सुप्तोत्थितस्य किं तत्स्यात्स्वर्गाय नरकाय वा ॥ ४४९ ॥ स्वप्नावस्थामें जो बड़े-से-बड़ा पुण्य अथवा पाप किया जाता है, क्या जग पड़नेपर वह स्वर्ग अथवा नरककी प्राप्तिका कारण हो सकता है?

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