विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)
Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 140, कुल 153 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपदेशका उपसंहार १४३ तद्देहादिबन्धेभ्यो विमुक्तं ब्रह्मवित्तमम्। पश्यन्ति देहिवन्मूढाः शरीराभासदर्शनात् ॥ ५४९ ॥ वास्तविक बातको न जाननेके कारण जैसे राहुसे ग्रस्त न होनेपर भी ग्रस्त-सा प्रतीत होनेके कारण लोग भ्रमवश सूर्यको राहु-ग्रस्त कहते हैं; वैसे ही देहादि-बन्धनसे छूटे हुए ब्रह्मवेत्ताका आभासमात्र शरीर देखकर अज्ञानीजन उसे देहयुक्त-सा मानते हैं। अहिनिर्व्लयनीवायं मुक्तदेहस्तु तिष्ठति। इतस्ततश्चाल्यमानो यत्किञ्चित्प्राणवायुना ॥ ५५० ॥ यह मुक्त पुरुषका शरीर तो साँपकी काँचुलीके समान प्राणवायुद्वारा कुछ इधर-उधर चलायमान होता हुआ पड़ा रहता है। [उसमें कर्तृत्वाभिमानका अत्यन्ताभाव होनेके कारण वास्तवमें क्रिया नहीं होती।] स्रोतसा नीयते दारु यथा निम्नोन्नतस्थलम्। दैवेन नीयते देहो यथाकालोपभुक्तिषु ॥ ५५१ ॥ जैसे जलके प्रवाहसे लकड़ी ऊँचे-नीचे स्थानोंमें बहा ले जायी जाती है, उसी प्रकार दैवके द्वारा ही उसका शरीर समयानुकूल भोगोंको प्राप्त करता है। प्रारब्धकर्मपरिकल्पितवासनाभिः संसारिवच्चरति भुक्तिषु मुक्तदेहः। सिद्धः स्वयं वसति साक्षिवदत्र तूष्णीं चक्रस्य मूलमिव कल्पविकल्पशून्यः ॥ ५५२ ॥ मुक्त पुरुषका शरीर प्रारब्धकर्मसे कल्पित वासनाओंद्वारा संसारी पुरुषके समान नाना भोगोंको भोगता है। सिद्ध पुरुष तो स्वयं कुलाल-चक्रके मूलकी भाँति संकल्प-विकल्पसे रहित होकर साक्षी-भावसे मौन होकर रहता है। नैवेन्द्रियाणि विषयेषु नियुङ्क्त एष नैवापयुङ्क्त उपदर्शनलक्षणस्थः। नैव क्रियाफलमपीषदवेक्षते स स्वानन्दसान्द्ररसपानसुमत्तचित्तः ॥ ५५३ ॥