भारतकोश
विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)

विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)

Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished153 पृष्ठ

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२० विवेक-चूडामणि शब्दजाल तो चित्तको भटकानेवाला एक महान् वन है, इसलिये किन्हीं तत्त्वज्ञानी महात्मासे प्रयत्नपूर्वक आत्मतत्त्वको जानना चाहिये। अज्ञानसर्पदष्टस्य ब्रह्मज्ञानौषधं विना। किमु वेदैश्च शास्त्रैश्च किमु मन्त्रैः किमौषधैः ॥ ६३ ॥ अज्ञानरूपी सर्पसे डँसे हुएको ब्रह्मज्ञानरूपी ओषधिके बिना वेदसे, शास्त्रसे, मन्त्रसे और औषधसे क्या लाभ ? अपरोक्षानुभवकी आवश्यकता न गच्छति विना पानं व्याधिरौषधशब्दतः। विनापरोक्षानुभवं ब्रह्मशब्दैर्न मुच्यते ॥ ६४ ॥ औषधको बिना पिये केवल औषध-शब्दके उच्चारणमात्रसे रोग नहीं जाता, इसी प्रकार अपरोक्षानुभवके बिना केवल 'ब्रह्म, ब्रह्म' कहनेसे कोई मुक्त नहीं हो सकता। अकृत्वा दृश्यविलयमज्ञात्वा तत्त्वमात्मनः। बाह्यशब्दैः कुतो मुक्तिरुक्तिमात्रफलैर्नृणाम् ॥ ६५ ॥ बिना दृश्य-प्रपंचका विलय किये और आत्मतत्त्वको जाने केवल बाह्य शब्दोंसे, जिनका फल केवल उच्चारणमात्र ही है, मनुष्योंकी मुक्ति कैसे हो सकती है ? अकृत्वा शत्रुसंहारमगत्वाखिलभूश्रियम्। राजाहमिति शब्दान्नो राजा भवितुमर्हति ॥ ६६ ॥ बिना शत्रुओंका वध किये और बिना सम्पूर्ण पृथिवीमण्डलका ऐश्वर्य प्राप्त किये, 'मैं राजा हूँ'—ऐसा कहनेसे ही कोई राजा नहीं हो जाता। आप्तोक्तिं खननं तथोपरिशिलाद्युत्कर्षणं स्वीकृतिं निक्षेपः समपेक्षते न हि बहिः शब्दैस्तु निर्गच्छति। तद्वद् ब्रह्मविदोपदेशमननध्यानादिभिर्लभ्यते मायाकार्यतिरोहितं स्वममलं तत्त्वं न दुर्युक्तिभिः ॥ ६७॥