भारतकोश
विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)

विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)

Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished153 पृष्ठ

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आत्म-निरूपण ३७ अब मैं तुझे परमात्माका स्वरूप बताता हूँ जिसे जानकर मनुष्य बन्धनसे छूटकर कैवल्यपद प्राप्त करता है। अस्ति कश्चित् स्वयं नित्यमहंप्रत्ययलम्बनः । अवस्थात्रयसाक्षी सन्पञ्चकोशविलक्षणः ॥ १२७ ॥ अहं-प्रत्ययका आधार कोई स्वयं नित्य पदार्थ है, जो तीनों अवस्थाओंका साक्षी होकर भी पंचकोशातीत है। यो विजानाति सकलं जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिषु । बुद्धितद्वृत्तिसद्भावमभावमहमित्ययम् ॥ १२८ ॥ जो जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति तीनों अवस्थाओंमें बुद्धि और उसकी वृत्तियोंके होने और न होनेको 'अहंभाव' से स्थित हुआ जानता है। यः पश्यति स्वयं सर्वं यं न पश्यति कश्चन । यश्चेतयति बुद्ध्यादिं न तु यं चेतयत्ययम् ॥ १२९ ॥ जो स्वयं सबको देखता है किन्तु जिसको कोई नहीं देख सकता, जो बुद्धि आदिको प्रकाशित करता है किन्तु जिसे बुद्धि आदि प्रकाशित नहीं कर सकते। येन विश्वमिदं व्याप्तं यन्न व्याप्नोति किञ्चन । आभारूपमिदं सर्वं यं भान्तमनुभात्ययम् ॥ १३० ॥ जिसने सम्पूर्ण विश्वको व्याप्त किया हुआ है किन्तु जिसे कोई व्याप्त नहीं कर सकता तथा जिसके भासनेपर यह आभासरूप सारा जगत् भासित हो रहा है। यस्य सन्निधिमात्रेण देहेन्द्रियमनोधियः । विषयेषु स्वकीयेषु वर्तन्ते प्रेरिता इव ॥ १३१ ॥ जिसकी सन्निधिमात्रसे देह, इन्द्रिय, मन और बुद्धि प्रेरित हुए-से अपने-अपने विषयोंमें बर्तते हैं। अहङ्कारादिदेहान्ता विषयाश्च सुखादयः । वेद्यन्ते घटवद्येन नित्यबोधस्वरूपिणा ॥ १३२ ॥