विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)
Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 36, कुल 153 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्यास ३९ विलीयमानेऽपि वपुष्यमुष्मिन् न लीयते कुम्भ इवाम्बरं स्वयम् ॥ १३६ ॥ वह न जन्मता है, न मरता है, न बढ़ता है, न घटता है और न विकारको प्राप्त होता है। वह नित्य है और इस शरीरके लीन होनेपर भी घटके टूटनेपर घटाकाशके समान लीन नहीं होता। प्रकृतिविकृतिभिन्नः शुद्धबोधस्वभावः सदसदिदमशेषं भासयन्निर्विशेषः । विलसति परमात्मा जाग्रदादिष्ववस्था- स्वहमहमिति साक्षात् साक्षिरूपेण बुद्धेः ॥ १३७॥ प्रकृति और उसके विकारोंसे भिन्न, शुद्ध ज्ञानस्वरूप, वह निर्विशेष परमात्मा सत्-असत् सबको प्रकाशित करता हुआ जाग्रत् आदि अवस्थाओंमें अहंभावसे स्फुरित होता हुआ बुद्धिके साक्षीरूपसे साक्षात् विराजमान है। नियमितमनसामुं त्वं स्वमात्मानमात्म- न्ययमहमिति साक्षाद्विद्धि बुद्धिप्रसादात्। जनिमरणतरङ्गापारसंसारसिन्धुं प्रतर भव कृतार्थो ब्रह्मरूपेण संस्थः ॥ १३८ ॥ तू इस आत्माको संयतचित्त होकर बुद्धिके प्रसन्न होनेपर 'यह मैं हूँ'—ऐसा अपने अन्तःकरणमें साक्षात् अनुभव कर। और [ इस प्रकार ] जन्म-मरणरूपी तरंगोंवाले इस अपार संसार-सागरको पार कर तथा ब्रह्मरूपसे स्थित होकर कृतार्थ हो जा। अध्यास अत्रानात्मन्यहमिति मतिर्बन्ध एषोऽस्य पुंसः प्राप्तोऽज्ञानाज्जननमरणक्लेशसम्पातहेतुः । येनैवायं वपुरिदमसत्सत्यमित्यात्मबुद्ध्या पुष्यत्युक्षत्यवति विषयैस्तन्तुभिः कोशकृद्वत् ॥ १३९ ॥