विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)
Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 64, कुल 153 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहावाक्य-विचार ६७ अहेयमनुपादेयं मनोवाचामगोचरम्। अप्रमेयमनाद्यन्तं ब्रह्म पूर्णं महन्महः॥ २४२॥ वह ब्रह्म त्याग अथवा ग्रहणके अयोग्य, मन-वाणीका अविषय, अप्रमेय, आदि-अन्तरहित, परिपूर्ण तथा महान् तेजोमय है। महावाक्य-विचार तत्त्वं पदाभ्यामभिधीयमानयो- र्ब्रह्मात्मनोः शोधितयोर्यदीत्थम्। श्रुत्या तयोस्तत्त्वमसीति सम्य- गकत्वमेव प्रतिपाद्यते मुहुः॥ २४३॥ 'तत्त्वमसि' (छान्दो० ६।८) आदि वाक्योंके तत् और त्वम् पदोंसे शोधन करके कहे हुए ब्रह्म और आत्माका श्रुतिके द्वारा बारम्बार पूर्ण एकत्व प्रतिपादन किया गया है। ऐक्यं तयोर्लक्षितयोर्न वाच्ययो- र्निगद्यतेऽन्योन्यविरुद्धधर्मिणोः । खद्योतभान्वोरिव राजभृत्ययोः कूपाम्बुराश्योः परमाणुमेर्वोः॥ २४४॥ उन सूर्य और खद्योत (जुगनू), राजा और सेवक, समुद्र और कूप तथा सुमेरु और परमाणुके समान परस्पर विरुद्ध धर्मवालोंका एकत्व लक्ष्यार्थमें ही कहा गया है, वाच्यार्थमें नहीं। तयोर्विरोधोऽयमुपाधिकल्पितो न वास्तवः कश्चिदुपाधिरेषः। ईशस्य माया महदादिकारणं जीवस्य कार्यं शृणु पंचकोशम्॥ २४५॥ उन दोनोंका यह विरोध उपाधिके कारण है और यह उपाधि कुछ वास्तविक नहीं है। ईश्वरकी उपाधि महत्तत्वादिकी कारणरूपा माया है तथा जीवकी उपाधि कार्यरूप पंचकोश हैं। 133 विवेक-चूडामणि-3 C