भारतकोश
विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)

विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)

Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished153 पृष्ठ

पृष्ठ 74, कुल 153 में से

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अध्यास-निरास ७७ अनात्मवासनाओंके समूहसे आत्मवासना छिप गयी है; इसलिये निरन्तर आत्मनिष्ठामें स्थित रहनेसे उनका नाश हो जानेपर वह स्पष्ट भासने लगती है। यथा यथा प्रत्यगवस्थितं मन- स्तथा तथा मुञ्चति बाह्यवासनाः । निःशेषमोक्षे सति वासनाना- मात्मानुभूतिः प्रतिबन्धशून्या ॥ २७७ ॥ मन जैसे-जैसे अन्तर्मुख होता जाता है, वैसे-वैसे ही वह बाह्य वासनाओंको छोड़ता जाता है। जिस समय वासनाओंसे पूर्णतया छुटकारा हो जाता है, उस समय आत्माका प्रतिबन्धशून्य अनुभव होने लगता है। अध्यास-निरास स्वात्मन्येव सदा स्थित्या मनो नश्यति योगिनः । वासनानां क्षयश्चातः स्वाध्यासापनयं कुरु ॥ २७८ ॥ [ चित्तवृत्तियोंको रोककर ] निरन्तर आत्मस्वरूपमें ही स्थिर रहनेसे योगीका मन नष्ट हो जाता है और उसकी वासनाओंका भी क्षय हो जाता है इसलिये अपने अध्यासको दूर करो। तमो द्वाभ्यां रजः सत्त्वात्सत्त्वं शुद्धेन नश्यति । तस्मात्सत्त्वमवष्टभ्य स्वाध्यासापनयं कुरु ॥ २७९ ॥ रजोगुण और सत्त्वगुणसे तम, सत्त्वगुणसे रज और शुद्ध सत्त्वसे सत्त्वगुणका नाश होता है, इसलिये शुद्ध सत्त्वका आश्रय लेकर अपने अध्यासका त्याग करो। प्रारब्धं पुष्यति वपुरिति निश्चित्य निश्चलः । धैर्यमालम्ब्य यत्नेन स्वाध्यासापनयं कुरु ॥ २८० ॥ प्रारब्ध ही शरीरका पोषण करता है, ऐसा निश्चय कर निश्चलभावसे धैर्य धारण करके यत्नपूर्वक अपने अध्यासको छोड़ो।