भारतकोश
विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)

विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)

Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished153 पृष्ठ

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अहंकार-नन्दा ८१ विकारिणां सर्वविकारवेत्ता नित्योऽविकारो भवितुं समर्हति। मनोरथस्वप्नसुषुप्तिषु स्फुटं पुनः पुनर्दृष्टमसत्त्वमेतयोः ॥ २९६ ॥ अहंकार आदि विकारी वस्तुओंके समस्त विकारोंको जाननेवाला नित्य तथा अविकारी ही होना चाहिये। मनोरथ, स्वप्न और सुषुप्ति- कालमें इन स्थूल-सूक्ष्म दोनों शरीरोंका अभाव बार-बार स्पष्ट देखा गया है [ अतः ये 'अहंपदार्थ आत्मा' कैसे हो सकते हैं? ] अतोऽभिमानं त्यज मांसपिण्डे पिण्डाभिमानिन्यपि बुद्धिकल्पिते। कालत्रयाबाध्यमखण्डबोधं ज्ञात्वा स्वमात्मानमुपैहि शान्तिम् ॥ २९७ ॥ इसलिये इस मांस-पिण्ड और इसके बुद्धि-कल्पित अभिमानी जीवमें अहंबुद्धि छोड़ो और अपने आत्माको तीनों कालोंमें अबाधित और अखण्ड ज्ञानस्वरूप जानकर शान्ति-लाभ करो। त्यजाभिमानं कुलगोत्रनाम- रूपाश्रमेष्वाद्र्रशवाश्रितेषु । लिङ्गस्य धर्मानपि कर्तृतादीं- स्त्यक्त्वा भवाखण्डसुखस्वरूपः ॥ २९८ ॥ इस लिबलिबे मांस-पिण्डके आश्रित रहनेवाले कुल, गोत्र, नाम, रूप और आश्रमका अभिमान छोड़ो तथा कर्तापन, भोक्तापन आदि लिंगदेहके धर्मोंको भी त्यागकर अखण्ड आनन्दस्वरूप हो जाओ। अहंकार-निन्दा सन्त्यन्ये प्रतिबन्धाः पुंसः संसारहेतवो दृष्टाः। तेषामेकं मूलं प्रथमविकारो भवत्यहङ्कारः ॥ २९९ ॥