विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)
Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 81, कुल 153 में से
संदर्भ में पढ़ें८४ विवेक-चूडामणि इस अहंकाररूप अध्यासके बिना तुझ सर्वदा एकरूप, चिदात्मा, व्यापक, आनन्दस्वरूप, पवित्रकीर्ति और अविकारी आत्माको और किसी प्रकार संसार-बन्धनकी प्राप्ति नहीं हो सकती। तस्मादहङ्कारमिमं स्वशत्रुं भोक्तुर्गले कण्टकवत्प्रतीतम्। विच्छिद्य विज्ञानमहासिना स्फुटं भुङ्क्ष्वात्मसाम्राज्यसुखं यथेष्टम् ॥ ३०८ ॥ इसलिये हे विद्वन् ! भोजन करनेवाले पुरुषके गलेमें काँटेके समान खटकनेवाले इस अहंकाररूप अपने शत्रुको विज्ञानरूप महाखड्गसे भली प्रकार छेदन कर आत्म-साम्राज्य-सुखका यथेष्ट भोग करो। ततोऽहमादेर्विनिवर्त्य वृत्तिं सन्त्यक्तरागः परमार्थलाभात्। तूष्णीं समास्वात्मसुखानुभूत्या पूर्णात्मना ब्रह्मणि निर्विकल्पः ॥ ३०९ ॥ फिर अहंकार आदिकी कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदि वृत्तियोंको हटाकर परमार्थ-तत्त्वकी प्राप्तिसे रागरहित होकर आत्मानन्दके अनुभवसे ब्रह्मभावमें पूर्णतया स्थित होकर निर्विकल्प और मौन हो जाओ। समूलकृत्तोऽपि महानहं पुन- र्व्युल्लेखितः स्याद्यदि चेतसा क्षणम्। सञ्जीव्य विक्षेपशतं करोति नभस्वता प्रावृषि वारिदो यथा ॥ ३१० ॥ यह प्रबल अहंकार जड़-मूलसे नष्ट कर दिया जानेपर भी यदि एक क्षणमात्रको चित्तका सम्पर्क प्राप्त कर ले तो पुनः प्रकट होकर सैकड़ों उत्पात खड़े कर देता है; जैसे कि वर्षाकालमें वायुसे संयुक्त हुआ मेघ।