भारतकोश
विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)

विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)

Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished153 पृष्ठ

पृष्ठ 91, कुल 153 में से

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९४ विवेक-चूड़ामणि आरूढशक्तेरहमो विनाशः कर्तुं न शक्यः सहसापि पण्डितैः । ये निर्विकल्पाख्यसमाधिनिश्चला- स्तानन्तरानन्तभवा हि वासनाः ॥ ३४३ ॥ अहंकारकी शक्ति जबतक बढ़ी-चढ़ी रहती है तबतक कोई विद्वान् उसका एकाएकी नाश नहीं कर सकता, क्योंकि जो महापुरुष निर्विकल्प- समाधिमें अविचल-भावसे स्थित हो गये हैं उनके अन्दर भी अनन्त जन्मोंकी वासनाएँ देखी जाती हैं। अहंबुद्ध्यैव मोहिन्या योजयित्वावृतेर्बलात् । विक्षेपशक्तिः पुरुषं विक्षेपयति तद्गुणैः ॥ ३४४ ॥ मोहित कर देनेवाली अहंबुद्धिके साथ अपनी आवरणशक्तिके द्वारा पुरुषका संयोग कराकर विक्षेपशक्ति उस (अहंबुद्धि)-के गुणोंसे मनुष्यको विक्षिप्त कर देती है। विक्षेपशक्तिविजयो विषमो विधातुं निःशेषमावरणशक्तिनिवृत्त्यभावे । दृग्दृश्ययोः स्फुटपयोजलवद्विभागे नश्येत्तदावरणमात्मनि च स्वभावात् । निःसंशयेन भवति प्रतिबन्धशून्यो विक्षेपणं न हि तदा यदि चेन्मृषार्थे ॥ ३४५ ॥ सम्यग्विवेकः स्फुटबोधजन्यो विभज्य दृग्दृश्यपदार्थतत्त्वम् । छिनत्ति मायाकृतमोहबन्धं यस्माद्विमुक्तस्य पुनर्न संसृतिः ॥ ३४६ ॥ आवरणशक्तिकी पूर्ण निवृत्तिके बिना विक्षेप-शक्तिपर विजय प्राप्त करना अत्यन्त कठिन है। दूध और जलके समान द्रष्टा और दृश्यके अलग-अलग होनेका स्पष्ट ज्ञान हो जानेपर आत्मामें छायी हुई वह

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