विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)
Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 97, कुल 153 में से
संदर्भ में पढ़ें१०० विवेक-चूडामणि प्रकार मन ध्यानके द्वारा सत्त्व-रज-तमरूप मलको त्यागकर आत्मतत्त्वको प्राप्त कर लेता है। निरन्तराभ्यासवशात्तदित्थं पक्वं मनो ब्रह्मणि लीयते यदा। तदा समाधिः स विकल्पवर्जितः स्वतोऽद्वयानन्दरसानुभावकः ॥ ३६३ ॥ जिस समय रात-दिनके निरन्तर अभ्याससे परिपक्व होकर मन ब्रह्ममें लीन हो जाता है, उस समय अद्वितीय ब्रह्मानन्दरसका अनुभव करानेवाली वह निर्विकल्प-समाधि स्वयं ही सिद्ध हो जाती है। समाधिनानेन समस्तवासना- ग्रन्थेर्विनाशोऽखिलकर्मनाशः । अन्तर्बहिः सर्वत एव सर्वदा स्वरूपविस्फूर्तिरयत्नतः स्यात् ॥ ३६४ ॥ इस निर्विकल्प-समाधिसे समस्त वासना-ग्रन्थियोंका नाश हो जाता है तथा वासनाओंके नाशसे सम्पूर्ण कर्मोंका भी नाश हो जाता है और फिर बाहर- भीतर सर्वत्र बिना प्रयत्नके ही निरन्तर स्वरूपकी स्फूर्ति होने लगती है। श्रुतेः शतगुणं विद्यान्मननं मननादपि। निदिध्यासं लक्षगुणमनन्तं निर्विकल्पकम् ॥ ३६५ ॥ वेदान्तके श्रवणमात्रसे उसका मनन करना सौगुना अच्छा है और मननसे भी लाखगुना श्रेयस्कर निदिध्यासन (आत्मभावनाको अपने चित्तमें स्थिर करना) है तथा निदिध्यासनसे भी अनन्तगुना निर्विकल्प-समाधिका महत्त्व है [जिससे चित्त फिर आत्मस्वरूपसे कभी चलायमान ही नहीं होता]। निर्विकल्पकसमाधिना स्फुटं ब्रह्मतत्त्वमवगम्यते ध्रुवम्। नान्यथा चलतया मनोगतेः प्रत्ययान्तरविमिश्रितं भवेत् ॥ ३६६ ॥ 133 विवेक-चूडामणि—4 D