भारतकोश
बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)

बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)

Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana

महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 101, कुल 350 में से

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( १०० ) ५. शुक्रवलय : इसे अंग्रेजी में "गर्डल आफ वीनस" कहते हैं तथा संस्कृत में इसको भृगु रेखा, शुक्र रेखा या शुक्र वलय कहा जाता है। यह वलय तर्जनी और मध्यमा के बीच में से प्रारम्भ होकर अनामिका और कनिष्ठिका के बीच में जाकर समाप्त होता है। इस प्रकार यह रेखा शनि और सूर्य दोनों पर्वतों को घेर लेता है। कई हाथों में यह वलय दोहरी रेखाओं से बनता है। यद्यपि इसका नाम शुक्र वलय होता है परन्तु इसका शुक्र पर्वत से किसी प्रकार का कोई सम्बन्ध नहीं होता। यह वलय व्यक्ति के हाथों में बहुत अधिक महत्त्वपूर्ण कहा जाता है। शुक्रवलय

६. चन्द्र रेखा : यह धनुष के आकार की रेखा होती है तथा यह चन्द्र क्षेत्र से प्रारम्भ होकर वरुण तथा प्रजापति क्षेत्रों के ऊपर से चलती हुई बुध पर्वत तक जाकर रुकती है, बहुत ही कम लोगों के हाथों में यह रेखा देखने को मिलती है। चन्द्र रेखा

७. प्रभावक रेखा : अंग्रेजी में इस रेखा को "लाइन ऑफ इन्फ्लुएन्स" कहते हैं। तथा यह जिस रेखा के साथ में भी होता है उस रेखा के प्रभाव को बढ़ा देती है। यह रेखा चन्द्र क्षेत्र तथा वरुण क्षेत्र के ऊपर से चलकर भाग्य रेखा तक पहुँचती है। कुछ लोगों के हाथों में यह रेखा दुहरी तथा कुछ लोगों के हाथों में यह तिहरी दिखाई पड़ती है। इसका प्रारम्भ शुक्र पर्वत से भी देखा जा सकता है परन्तु इस प्रकार का प्रारम्भ बहुत कम हाथों में अनुभव हुआ है। प्रभावक रेखा

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