भारतकोश
बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)

बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)

Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana

महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

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( १५१ ) २७. यदि बुध क्षेत्र पर दो समानान्तर रेखाएं हों तो उसके दो विवाह होते हैं ऐसा समझना चाहिए । २८. यदि विवाह रेखा आगे चलकर सूर्य रेखा से मिलती हो तो उसकी पत्नी उच्च पद पर नौकरी करने वाली होती है । २९. दो हृदय रेखाएं हों तो व्यक्ति का विवाह अत्यन्त कठिनाई से होता है । ३०. यदि चन्द्र पर्वत से रेखा आकर विवाह रेखा से मिले तो ऐसा व्यक्ति भोगी कामुक तथा गुप्त प्रेम रखने वाला होता है । ३१. यदि मंगल रेखा से कोई रेखा आकर विवाह रेखा से मिले तो उसके विवाह में बराबर बाधाएं बनी रहती हैं । ३२. विवाह रेखा पर जो खड़ी लकीरें होती हैं वे सन्तान रेखाएं कहलाती हैं । ३३. सन्तान रेखाएं अत्यन्त महीन होती हैं जिन्हें नंगी आंखों से देखा जाना सम्भव नहीं होता । ३४. इन सन्तान रेखाओं में जो लम्बी और पुष्ट होती हैं वे पुत्र रेखाएं होती हैं तथा जो महीन और कमजोर होती हैं उन्हें कन्या रेखा समझना चाहिए । ३५. यदि इनमें से कोई रेखा टूटी हुई हो तो उस बालक की मृत्यु समझनी चाहिए । ३६. यदि मणिबन्ध कमजोर हो तथा शुक्र पर्वत अविकसित हो तो ऐसे व्यक्ति को जीवन में सन्तान सुख नहीं रहता । ३७. यदि स्पष्ट और सीधी रेखाएं होती हैं तो सन्तान स्वस्थ होती है परन्तु यदि कमजोर रेखाएं होती हैं तो सन्तान भी कमजोर समझनी चाहिए । ३८. विवाह रेखा को ६० वर्ष का समझ कर इस रेखा पर जहां पर भी गहरा पन दिखाई दे आयु के उस भाग में विवाह समझना चाहिए । वस्तुतः विवाह रेखा का अपने आप में महत्व है । और इस रेखा का अध्ययन पूर्णतः सावधानी के साथ किया जाना चाहिए ।