भारतकोश
बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)

बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)

Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana

महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 189, कुल 350 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 189

( १८८ ) ४. नग्नावस्था में, बिना स्नान के, अपवित्र हाथ से, सिर पर कपड़ा रख कर भी जप करना निषिद्ध है। ५. जप के समय माला पूरी हुए बिना बातचीत नहीं करनी चाहिए। ६. छींक अस्पृश्य, उपान वायु होने पर हाथ धोवें तथा कानों के जल स्पर्श करें। ७. आलस्य, जमहाई, छींक, नींद, थकना, डरना, अपवित्र वस्त्र, बातचीत क्रोध आदि जपकाल में वर्जित है। ८. पहले दिन जितना जप किया जाय रोज उतना ही जप करें। इसे घटाना बढ़ाना उचित नहीं। ६. जपकाल में शौच जाने पर पुनः स्नान कर जप में बैठें। जपकाल में नियम : जपकाल में निम्न नियमों का भी पालन किया जाना चाहिए :— १. भूमि शयन २. ब्रह्मचर्य ३. नित्य स्नान ४. मौन ५. नित्य दान ६. गुरु सेवा ७. पापकर्म परित्याग ८. नित्य पूजा ६. देवतार्चन १०. इष्टदेव व गुरु में श्रद्धा ११. जप निष्ठा एवं १२. पवित्रता अब मैं आगे के पृष्ठों में पंचांगुली मंत्र तथा काल ज्ञान मंत्र के साथ-साथ संकल्प भी स्पष्ट कर रहा हूं। सबसे पहले साधक को संकल्प करना चाहिए। उसके बाद पांच बार काल ज्ञान मंत्र का उच्चारण करना चाहिए और उसके बाद पंचांगुली यंत्र के सामने पंचांगुली का ध्यान करके एक सौ आठ बार पंचांगुली मंत्र का जप करना चाहिए, सबके अन्त में पंचांगुली ध्यान समाप्ति करनी चाहिए। इस प्रकार ६० साठ दिन तक करने से निश्चय ही पंचांगुरी साधना मंत्र सिद्ध होता है। या केवल एक लाख काल ज्ञान मंत्र जपने से भी भूत, भविष्य, सिद्धि हो जाती है।

बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक) · पृष्ठ 189, कुल 350 में से · BharatKosha