भारतकोश
बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)

बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)

Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana

महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

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( १६६ ) ७. आई० ए० एस० : आई० ए० एस० व्यक्ति कलेक्टर, सेक्रेटरी या प्रशासन के महत्वपूर्ण पद पर रहते हैं और ऐसे व्यक्ति शासन में बहुत अधिक सहायक होते हैं । जिनके हाथों में बुध की उंगली अर्थात् कनिष्ठिका लम्बाई लिये हुए हो और उसका अन्तिम सिरा अनामिका के तीसरे पोर से आगे अर्थात् आधे से अधिक हिस्से तक पहुंच चुकी हो इसके साथ ही साथ सूर्य रेखा अत्यन्त उच्च कोटि की हो तो वह व्यक्ति आई० ए० एस० अधिकारी होता है । यदि सूर्य रेखा में कमजोरी होती है, या कटी हुई होती है, तो वह व्यक्ति मात्र आई० ए० एस० अधिकारी आई. ए. एस. ही होकर रह जाता है । यदि कनिष्ठिका लम्बी हो, सूर्य रेखा भी अपने आप में पुष्ट हो तथा मस्तिष्क रेखा पूर्ण विकसित हो और उसके साथ ही साथ भाग्य रेखा लम्बी निर्दोष तथा पूर्ण हो तो वह व्यक्ति केन्द्रीय सरकार में उच्च पदस्थ अधिकारी होता है । भाग्य रेखा तथा गुरु पर्वत बहुत अधिक श्रेष्ठ हों तो वह व्यक्ति निश्चय ही केन्द्रीय सेवा में सेक्रेटरी या अत्यन्त उच्च पदस्थ व्यक्ति होता है, जिसके कार्यों का प्रशासन पर पूरा-पूरा प्रभाव पड़ता है । ८. नाविक : ( जल सेना ) :-जो नाव पर या जहाज पर कार्य करने वाले होते हैं अथवा नेवी में उच्चपदस्थ अधिकारी होते हैं उनको यहां नाविक के नाम से सम्बोधित कर रहा हूं । एक श्रेष्ठ तथा कुशल जलसेना नायक का हाथ पूर्ण लम्बाई लिये हुए होता है तथा उस पर चन्द्र पर्वत पूर्ण विकसित अवस्था में होता है । जिसकी हथेली में चन्द्र पर्वत विकसित हो तथा चन्द्रमा के पर्वत से रेखा निकलकर सूर्य की तरफ जा रही हो एवं भाग्य रेखा तथा मस्तिष्क रेखा अपने आप में पूर्ण विक- सित हो तो वह व्यक्ति निस्संदेह जल सेनाध्यक्ष होता है । यदि चन्द्र पर्वत कम उभरा हुआ हो या चन्द्र रेखा कमजोर हो और अन्य सभी गुण हथेली में हों तो वह नेवी में नाविक उच्च पद पर कार्य करने वाला होता है ।