भारतकोश
बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)

बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)

Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana

महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

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( २६५ ) रश्मि योग : परिभाषा : यदि मणिबन्ध से कोई रेखा शुक्र पर्वत पर पहुँचती हो तथा शुक्र पर्वत अत्यन्त अधिक पुष्ट उठा हुआ सुन्दर गम्भीर तथा लालिमा लिए हुए हो तो रश्मि योग होता है। फल : इस योग में जन्म लेने वाले व्यक्ति के जीवन में किसी प्रकार का कोई अभाव नहीं रहता और वह अपने परि- श्रम से पूर्ण बाहन सुख, धन, यश तथा सम्मान अर्जित करता है। टिप्पणी : विद्वानों ने निम्नलिखित योग भी रश्मि [चित्र: रश्मि योग] योग माने हैं । १. यदि हाथ में कहीं पर भी स्वस्तिक का चिन्ह हो । २. हाथ में चन्द्र पर्वत पर एक खड़ी और एक आड़ी रेखा हो तथा उसके नीचे क्रॉस न हो। ३. हाथ में दो स्वास्थ्य रेखाएं हों । दिव्य योग : परिभाषा : जिसके दाहिने हाथ में गुरु रेखा शुक्र पर्वत पर पहुँचती हो तथा शुक्र पर्वत से एक रेखा गुरु पर्वत पर पहुँचती हो पर सूर्य रेखा तथा बुध रेखा अपने आप में बलवान हो तो दिव्य योग होता है । फल : दिव्य योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति पूर्ण आनन्द उपयोग करता है। यद्यपि वह परिश्रम पूर्वक धन इकट्ठा करता है, परन्तु फिर भी समाज मे उसका सम्मान होता है तथ। आर्थिक दृष्टि से पूर्ण सम्पन्न एवं सुखी रहता है। टिप्पणी : सामुद्रिक शास्त्र के विद्वानों ने निम्न योग [चित्र: दिव्य योग] भी दिव्य योग माने हैं । १. यदि हाथ में मंगल पर्वत से सूर्य पर्वत तक रेखा जाती हो और सूर्य पर्वत में मगल पर्वत तक कोई रेखा जाती हो । २. यदि हाथ में चन्द्रमा का पर्वत अत्यन्त पुष्ट और बलवान हो तथा उसका संबंध भाग्य रेखा से होता हो । ३. यदि हाथ में बुध और चन्द्रमा का परस्पर रेखा संबंध हो गया हो । ४. यदि हाथ में दो मस्तिष्क रेखाएं हों पर आपस में कहीं पर भी मिलती न हों।