बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)
Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana
महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १४ ) [•••••] का प्रारंभ वृहस्पति पर्वत के पास से या वृहस्पति पर्वत के ऊपर से होता है। अधिकांश हाथों में मैंने जीवन रेखा और मस्तिष्क रेखा का उद्गम एक ही स्थान पर देखा है। परन्तु कई हाथों में यह उद्गम एक ही न होकर पास-पास होता देखा गया है। यह रेखा हथेली को दो भागों में बांटती हुई राहू और हर्षल क्षेत्रों को अलग-अलग करती हुई बुध क्षेत्र के नीचे तक चली जाती है, इस पूरी रेखा को मस्तिष्क रेखा कहते हैं। इस रेखा की स्थिति अलग-अलग हाथों में अलग-अलग प्रकार से देखी जाती है। जिन व्यक्तियों का मस्तिष्क पैना, उर्वर, तथा क्रियाशील होता है या जो व्यक्ति मुख्यतः बुद्धिजीवी होते हैं उन व्यक्तियों के हाथों में यह रेखा लम्बी गहरी और स्पष्ट होती है। इसके विपरीत जो शारीरिक श्रम करने वाले होते हैं या जिनका मस्तिष्क कमजोर होता है अथवा जो श्रमजीवी होते हैं उनके हाथों में या तो यह रेखा धूमिल और अस्पष्ट-सी होती है अथवा यह रेखा बीच-बीच में कई स्थान पर टूटी हुई-सी दिखाई देती है। इस रेखा से मानव के मस्तिष्क का भलीभांति अध्ययन किया जा सकता है। ३. हृदय रेखा :—इस रेखा को अंग्रेजी में 'हार्ट लाइन' और भारत में इस रेखा को विचार रेखा कहते हैं। यह रेखा बुध पर्वत के नीचे से प्रारंभ होकर बुध तथा प्रजापति के क्षेत्रों को अलग-अलग करती हुई तर्जनी के नीचे या गुरु पर्वत के नीचे तक पहुंच जाती है। सामान्यतः यह रेखा सभी व्यक्तियों के हाथों में दिखाई देती है क्योंकि इस रेखा का सीधा सम्बन्ध हृदय से होता है, परन्तु मैंने कुछ डाकुओं एव हृदयहीन व्यक्तियों के हाथों में इस रेखा का सर्वथा अभाव ही देखा है। जिन व्यक्तियों के हाथों में यह रेखा कमजोर होती है वस्तुतः वे व्यक्ति अमानवीय एवं क्रूर होते हैं।
हृदय रेखा हृदय रेखा