व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)
Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary
महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमाह्निकम् (पस्पशा) ५६ अनुवाद—तो ऐसे में न हीं (केवल) ज्ञान में धर्म है न (केवल) प्रयोग में । तो क्या है ? "वेद के शब्द के समान शास्त्रपूर्वक प्रयोग में अभ्युदय है"— शास्त्रज्ञान पूर्वक जो शब्दों का प्रयोग करता है, वह अभ्युदय से युक्त होता है । 'तत्तुल्यं वेदशब्देन' का अभिप्राय है । कि वेद शब्द भी इसी प्रकार से कहते हैं ।—"जो अग्निष्टोम यज्ञ करता है और जो इसे इस प्रकार से जानता है," "जो नाचिकेत अग्नि का चयन करता है और जो इसे इस प्रकार से जानता है"। "तत्तुल्यं वेदशब्देनेति" (के व्याख्यान में) दूसरा कहता है कि जिस प्रकार से वेदशब्द नियमपूर्वक अध्ययन किये गये फलवान् होते हैं उसी प्रकार से जो शास्त्रपूर्वक शब्दों का प्रयोग करता है, वह अभ्युदय से युक्त होता है , उषा—शब्दज्ञान तथा शब्द प्रयोग दोनों ही पक्षों के निरस्त हो जाने पर सिद्धान्ती श्रुति को प्रमाण मानता हुआ इन दोनों पक्षों में समन्वय स्थापित करके शास्त्र ज्ञानपूर्वक साधु शब्द के प्रयोग से धर्म प्राप्ति के पक्ष को सिद्धान्त के रूप में उपस्थापित करता है, अर्थात् जो ज्ञानपूर्वक साधु शब्दों का प्रयोग करता है, वह अभ्युदय से युक्त होता है । अपने इस सिद्धान्त पक्ष के समर्थन में भगवत्पाद ने वेद के वाक्यों को प्रमाण के रूप में उपस्थित किया है । क्योंकि व्याकरण की दार्शनिक परम्परा भी शब्द- प्रमाणवादी है, यहाँ शब्द को प्रत्यक्ष के समान ही प्रामाणिक माना जाता है । भर्तृहरि ने वाक्यपदीय में इस विषय में कहा है कि— आविर्भूतप्रकाशानामनुपप्लुतचेतसाम् । अतीतानागतज्ञानं प्रत्यक्षान्न विशिष्यते ॥ "योऽग्निष्टोमेन यजते य उ चैनमेवं वेद", "योऽग्निं नाचिकेतं चिनुते य उ चैनमेवं वेद" इत्यादि वेदवाक्य ज्ञान और प्रायोगिकता दोनों की साथ-साथ स्थिति को अभ्युदय हेतुत्व के रूप में स्वीकार करते हैं । "शब्दक्रमादर्थक्रमो बलीयान्" इस नियम से इन वेद वाक्यों में "य उ चैनमेवं वेद" इस भाग का अन्वय पहले होना चाहिए, क्योंकि पहले ज्ञान तथा उसके अनन्तर ही अनुष्ठान की कल्पना सम्भव हो सकती है । "तत्तुल्यं वेदशब्देन" की एक अन्य व्याख्या भी भाष्यकार ने उपस्थापित की है कि वेद जिस प्रकार से नियमपूर्वक अध्ययन किये जाने पर फल से युक्त होते हैं, उसी प्रकार से शास्त्रज्ञानपूर्वक जो शब्द का प्रयोग करता है, वह अभ्युदय से युक्त होता है । वेद का अध्ययन भी ज्ञानपूर्वक ही करने का विधान है— अविदित्वा ऋषि छन्दो दैवतं योगमेव च । योऽध्यापयेज्जपेद् वापि पापीयाञ्जायते तु सः ॥