याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary
महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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१३० याज्ञवल्क्यस्मृतिः प्रवाह वाले मनु आदि ऋषियों ने जिसे पवित्र बनाया है उस जल से (विनायक गृहीत) तुम्हारा अभिषिञ्चन करता हूँ। ये जल तुम्हें पवित्र करें॥ २८१ ॥ भगं ते वरुणो राजा भगं सूर्यो बृहस्पतिः । भगमिन्द्रश्च वायुश्च भगं सप्तर्षयो ददुः ॥ २८२ ॥ तदनन्तरं दक्षिणदेशावस्थितं द्वितीयं कलशमादायानेन मन्त्रेणाभिषिञ्चेत् । भगं कल्याणं ते तुभ्यं वरुणो राजा भगं सूर्यो, भगं बृहस्पतिः भगमिन्द्रश्च वायुश्च भगं सप्तर्षयश्च ददुरिति ॥ २८२ ॥ भाषा—( तब दक्षिण की ओर रखे हुए दूसरे कलश को लेकर उसे अभिषिञ्चित करे ) राजा वरुण ने तुझे कल्याण दिया है, सूर्य और बृहस्पति ने कल्याण ( प्रदान किया), इन्द्र और वायु ने कल्याण दिया है और सप्तर्षियों ने तुम्हें कल्याण दिया है ॥ २८२ ॥ यत्ते केशेषु दौर्भाग्यं सीमन्ते यच्च मूर्धनि । ललाटे कर्णयोरक्ष्णोरापस्तद् घ्नन्तु सर्व्वदा ॥ २८३ ॥ ततस्तृतीयं कलशमादायानेन मन्त्रेणाभिषिञ्चेत् । ते तव केशेषु यद्दौर्भाग्य- मकल्याणं सीमन्ते मूर्धनि च ललाटे कर्णयोरक्षणोश्च तत्सर्वमापो देव्यो घ्नन्तु उपशमयन्तु सर्व्वदा इति ॥ २८३ ॥ भाषा—( तब तीसरे कलश को लेकर इस मन्त्र से अभिषिञ्चन करें ) तुम्हारे केशों में, सीमन्त में, शिर, ललाट, कानों और आँखों में जो कुछ भी दौर्भाग्य या अकल्याण हो उसे आप ( जल ) देवता सदैव नष्ट करें ॥ २८३ ॥ स्नातस्य सार्षपं तैलं स्रुवेणौदुम्बरेण तु । जुहुयान्मूर्धनि कुशान्सव्येन परिगृह्य च ॥ २८४ ॥ ततश्चतुर्थं कलशमादाय पूर्वोक्तैस्त्रिभिर्मन्त्रैरभिषिञ्चेत् । 'सर्वमन्त्रैश्चतुर्थम्' इति मन्त्रलिङ्गात्² । उक्तेन प्रकारेण कृताभिषेकस्य मूर्धनि सव्यपाणिगृहीत- कुशान्तर्हिते सार्षपं तैलं उदुम्बरवृक्षोद्भवेन स्रुवेण वक्ष्यमाणैर्मन्त्रैर्जुहुयादा- चार्यः॥ २८४॥ भाषा—( तब चौथा कलश लेकर तीनों मन्त्रों से उसको स्नान करावे ) उसके स्नान कर लेने पर उसके सिर पर बायें हाथ से कुश फेर कर उदुम्बर वृक्ष की स्रुवा से सरसों के तेल का ( आचार्य ) हवन करे ॥ २८४ ॥
१. ते सदा । २. स्मृतिलिङ्गात् ।