भारतकोश
याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary

महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished782 पृष्ठ

पृष्ठ 188, कुल 782 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 188

१३२ याज्ञवल्क्यस्मृतिः सिद्धगन्धर्वा १मायाविद्याधरा नराः। दिक्पाला लोकपालाश्च ये च विघ्नविना- यकाः॥ जगतां शान्तिकर्तारो ब्रह्माद्याश्च महर्षयः। मा विघ्नो मा च मे पापं मा सन्तु परिपन्थिनः॥ सौम्या भवन्तु तृप्ताश्च भूतप्रेताः सुखावहाः॥ इत्येतैर्मन्त्रैः॥ कृताकृताः सकृदवहतास्तण्डुलाः, २पललं तिलपिष्टं तन्मिश्र ओदनः पललौदनः, मत्स्याः पक्वा अपक्वाश्च, मांसमेतावदेव पक्वमपक्वं च, पुष्पं चित्रं रक्तपीतादिनानावर्णम्। चन्दनादि सुगन्धिद्रव्यम्, सुरा त्रिविधा गौडी माध्वी पैष्टी च मूलकं कन्दाकारो भक्ष्यविशेषः, पूरिका प्रसिद्धा, अपूपोऽस्नेहपक्वो गोधूमविकारः। उण्डेरकस्त्रजः उण्डेरकाः पिष्टादिमय्यस्ताः प्रोताः स्रजः, दध्यन्नं दधिमिश्रमन्नं। पायसं पयः ३पयः शृतम्। गुडपिष्टं गुडमिश्रं शाख्यादिपिष्टम्। मोदकाः लड्‌डुकाः। अनन्तरं विनायकं तज्जननी- मम्बामम्बिकां वक्ष्यमाणमन्त्रेणोपतिष्ठेत्॥ २८६-२८९॥ किं कृत्वेत्याह- दूर्वासर्षपपुष्पाणां दत्त्वार्घ्यं पूर्णमञ्जलिम्॥ २९०॥ सकृसुमोदकेनाघ्र्यं दत्त्वा दूर्वासर्षपपुष्पाणां पूर्णमञ्जलिं दत्त्वा, 'उपतिष्ठेत्' इति गतेन संबन्धः॥ २९०॥ भाषा—मित, संमित, शाल, कटङ्कट, कूष्माण्ड और राजपुत्र के अन्त में स्वाहा जोड़कर हवन के मन्त्र होते हैं (यथा-ओं मिताय स्वाहा आदि) इन्हीं मन्त्रों से इन्द्र से लेकर ब्रह्मा तक अनन्त देवताओं के नाम से नमस्कार पूर्वक बलि देवे। (तब बचे हुए अंश को) सूप में कुश बिछाकर चौराहे पर रखे। बनाये गये और न बनाये गये चावल, पीसे हुए तिल से युक्त चावल, पकी-अधपकी मछली, पका और न पका हुआ मांस, अनेक वर्ण के फूल, चन्दन आदि सुगन्धि द्रव्य, (गौडी, माध्वी, पैष्टी) तीन प्रकार की सुरा, कन्द के समान मूल फल, पूरी, पूआ, उण्डेरक (छोटे-छोटे रोट) की माला, दही मिला हुआ अन्न, खीर, गुड से बनाये गये लड्डू-इन सब को लेकर भूमि में शिर लगाकर विनायक की माता अम्बिका को नमस्कार करे। इसके पहले दूब, सरसों और फूल अञ्जलि में लेकर अर्घ्य देवे॥ २८५-२९०॥ उपस्थानमन्त्रमाह- रूपं देहि ४यशो देहि भगं ५भवति देहि मे। पुत्रान्देहि धनं देहि सर्वकामांश्च देहि मे॥ २९१॥ १. माला विद्या; नागा विद्याधरा। २. पललं पिष्टं। ३. पैरेयी। ४. जयं देहि। ५. भगवन्।