भारतकोश
याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary

महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished782 पृष्ठ

पृष्ठ 389, कुल 782 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 389

यस्तु गणिनां मध्ये समूहहितवादिबचनप्रतिबन्धकारी स राज्ञा प्रथम- साहसं दण्डनीयः ॥ १८८ ॥ भाषा-( गण के व्यक्तियों में ) समूह का हित कहे उनका अनुसरण सभी को करना चाहिए । जो उसके (समूह के हित के) विपरीत बोले उसे प्रथम साहस का दण्ड देना चाहिए ॥ १८८ ॥ राज्ञा ^१चेत्थं गणेषु वर्तनीयमित्याह— समूहकार्य आयातान्कृतकार्यान्विसर्जयेत् । स दानमानसत्कारैः पूजयित्वा महीपतिः ॥ १८९ ॥ समूहकार्यनिर्वृत्त्यर्थं स्वपार्श्वं प्राप्तान् गणिनो निर्वर्तितारमीयप्रयोजनान् दानमानसत्कारैः स राजा परितोष्य विसर्जयेत् ॥ १८९ ॥ भाषा—समूह के कार्य के लिये आये हुए व्यक्तियों का कार्य करके राजा उन्हें दान, मान और सत्कार द्वारा सन्तुष्ट करके विदा करे ॥ १८९ ॥ समूहदत्तापहारिणं प्रत्याह— समूहकार्यप्रहितो यल्लभेत तदर्पयेत् । एकादशगुणं दाप्यो यद्यसौ नार्पयेत्स्वयम् ॥ १९० ॥ समूहकार्यार्थं महाजनैः प्रेषितो राजपार्श्वे यद्वसहिरण्यादिकं लभते तद्- प्रार्थित एव महाजनेभ्यो निवेदयेत् । अन्यथा लब्धादेकादशगुणं दण्डं दापनीयः ॥ १९० ॥ भाषा—समूह के कार्य से भेजा गया व्यक्ति जो कुछ पावे उसे समूह के श्रेष्ठ जनों के समक्ष अर्पित करे । यदि वह ऐसा धन नहीं अर्पित करता है तो उससे उसका ग्यारह गुना दण्ड लेना चाहिए ॥ १९० ॥ एवंप्रकाराश्च कार्यचिन्तकाः कार्या इत्याह— धर्मज्ञाः शुचयोऽलुब्धा भवेयुः कार्यचिन्तकाः । कर्तव्यं वचनं तेषां समूहहितवादिनाम् ॥ १९१ ॥ श्रौतस्मार्तधर्मज्ञा बाह्याभ्यन्तरशौचयुक्ता अर्थेष्वलुब्धाः कार्यविचारकाः कर्तव्याः । तेषां वचनमितरैः कार्यमित्येतदादरार्थं पुनर्वचनम् ॥ १९१ ॥ भाषा—श्रौत और स्मार्त धर्म जानने वाले, पवित्र, लोभहीन कार्य- विचारक बनाने चाहिए । उन समूह का हित कहने वालों के वचनों का पालन करना चाहिए ॥ १९१ ॥ १. चैवंगणिषु वर्तितव्यं । २. यद्यस्मै । ३. वेदज्ञाः ।