भारतकोश
याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary

महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished782 पृष्ठ

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( ३३ ) मुख्यतः शुक्लयजुर्वेद और शतपथब्राह्मण के द्रष्टा हैं। शतपथब्राह्मण में भी याज्ञवल्क्य के विषय में अनेक आख्यान आये हैं और इनमें याज्ञवल्क्य के विचारों को मान्यता दी गयी है। ११।३।१।२ में वे जनक को अग्निहोत्र यज्ञ समझाते हैं और स्वयं जनक से गूढ़ यज्ञिय क्रिया का ज्ञान प्राप्त करते हैं। ११।६।३ में. याज्ञवल्क्य और शाकल्य के शास्त्रार्थविवाद का वर्णन है, जिसमें देवताओं की संख्या के विषय में विचार किया गया है और अन्त में याज्ञवल्क्य के एकेश्वर- वाद के सिद्धान्त को स्वीकारा गया है। परन्तु याज्ञवल्क्य अपने प्रतिद्वन्द्वी शाकल्य को उनकी हठधर्मिता के कारण शीघ्र मृत्यु प्राप्त करने का शाप देते हैं। याज्ञवल्क्य को अनेक यज्ञों का उद्घोषक माना गया है। शतपथब्राह्मण के अतिरिक्त याज्ञवल्क्य का नाम किसी अन्य वैदिक ग्रन्थ में नहीं आता। शांखायन आरण्यक में दो स्थलों पर याज्ञवल्क्य का उल्लेख है किन्तु उन अंशों को विद्वानों ने शतपथब्राह्मण से उद्धृत माना है।१ याज्ञवल्क्य शुक्ल यजुर्वेद, शतपथब्राह्मण तथा बृहदारण्यकोपनिषद् के प्रणेता या उद्घोषक थे इस विषय में प्रायः सन्देह व्यक्त किया गया है। शुक्ल यजुर्वेद की संहिता वाजसनेयी-संहिता कहलाती है और यह नाम याज्ञवल्क्य की उपाधि वाजसनेय के आधार पर पड़ा है। यदि याज्ञवल्क्य इस संहिता के उद्घोषक न भी हों तो भी उन्हें संकलनकर्ता मानने में कोई आपत्ति नहीं। इसी प्रकार शतपथब्राह्मण का भी प्रचुर अंश सीधे याज्ञवल्क्यरचित है और शेष अंश को आधिकारिक रूप देने के लिए उनका नाम संबद्ध कर दिया गया है, ऐसी संभावना की जाती है। अतः जैसा कि जे० डाउसन ने कहा है : "यह मानने में कोई आपत्ति नहीं है कि शतपथब्राह्मण की रचना उनके अधीक्षण में या उनके शिष्यों द्वारा की गयी थी।"२ शतपथब्राह्मण से संबद्ध बृहदारण्यकोपनिषद् में याज्ञवल्क्य एक यज्ञक्रिया के आचार्य की अपेक्षा दार्शनिक के रूप में दिखायी पड़ते हैं। इस उपनिषद् में याज्ञवल्कीय काण्ड नाम का अंश विशेष रूप से उल्लेखनीय है जिसमें याज्ञवल्क्य की प्रशस्ति है और उनके आत्मविषयक दार्शनिक विचारों का संग्रह है। इस उपनिषद् में याज्ञवल्क्य का जिस प्रकार उल्लेख किया गया है उससे स्पष्ट है कि यह अकेले याज्ञवल्क्य की रचना न होकर उनके शिष्यों और अनुयायियों द्वारा भी रचित है। विण्टरनित्स का इस विषय में यह मत है कि स्वयं बृहदारण्यकोपनिषद् में अन्य आचार्यों का भी उल्लेख है। इसके अतिरिक्त याज्ञिक और तत्त्वचिन्तनविषयक इतने विभिन्न मतों को याज्ञवल्क्य से संबद्ध किया गया है कि उन्हें इन सबका उद्घोषक स्वीकारना कठिन प्रतीत होता है।३

१. मैकडानल एवं कीथ, वैदिक इण्डेक्स, भाग २, पृ० १८९ । २. ए क्लासिकल डिक्शनरी आफ हिन्दू माइथोलोजी, पृ० ३७२ । ३. हिस्ट्री आफ इण्डियन लिटरेचर, भाग १, पृ० २४६, टिप्पणी ।