भारतकोश
याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary

महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished782 पृष्ठ

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३६४ याज्ञवल्क्यस्मृतिः लाभालाभावुपचयापचयौ यथाद्रव्यं येन यावद्धनं पण्यग्रहणार्थं दत्तं तद- नुसारेणावसेयौ; यद्वा, -प्रधानगुणभावपर्यालोचनयास्य भागद्वयमस्यैको भाग इत्येवंरूपया संविदा समयेन यथा संप्रतिपन्नौ तथा वेदितव्यौ ॥ २५९ ॥ भाषा—यदि अनेक व्यापारी लाभ की इच्छा से इकट्ठे मिलकर ( साझे पर ) कार्य करें तो उन्हें अपनी लगाई पूंजी के अनुसार लाभ और हानि होती है अन्यथा उनमें परस्पर जैसी संविदा हुई हो उसके अनुसार लाभ या हानि का अंश मिलता है ॥ २५९ ॥ प्रतिषिद्धमनादिष्टं प्रमादाद्यच्च नाशितम् । स तद्दद्याद्विप्लवाच्च रक्षिताद्दशमांशभाक् ॥ २६० ॥ किंच । तेषां संभूय प्रचरतां मध्ये 'पण्यमिदमित्थं न व्यवहर्तव्यम्' इति प्रतिषिद्धमाचरता यच्चाशितमनादिष्टमननुज्ञातं वा कुर्वाणेन तथा प्रमादा- त्प्रज्ञाहीनतया वा येन यन्नाशितं स तत्पण्यं वणिग्भ्यो दद्यात् । यः पुनस्तेषां मध्ये चौरराजादिजनिताद्व्यसनात्पण्यं पालयति स तस्माद्रक्षितात्पण्याद्दश- मंशं लभते ॥ २६० ॥ भाषा—एक साथ मिलकर व्यापार करने वालों में जो व्यक्ति निषिद्ध विक्रय से, न कहा हुआ कार्य करके अथवा प्रमादवश कोई वस्तु नष्ट कर दे तो वह उस वस्तु को दे ( या हानि को पूरा करे ) । उनमें जो पण्य को राजा और चोर के उत्पात से सुरक्षित रखता है उसे दसवां अंश प्राप्त होता है ॥ २६० ॥ अर्घप्रक्षेपणाद्विंशं भागं शुल्कं नृपो हरेत् । व्यासिद्धं राजयोग्यं च विक्रीतं राजगामि तत् ॥ २६१ ॥ 'इयतः पण्यस्येयन्मूल्यम्' इत्यर्घः, तस्य प्रक्षेपणात् राजतो निरूपणा- द्धेतोरसौ मूल्याद्विंशतितममंशं शुल्कार्थं गृह्णीयात् । यत्पुनर्व्यासिद्धं 'अन्यत्र न विक्रेयम्' इति राज्ञा प्रतिषिद्धं, यच्च २ राजयोग्यं मणिमाणिक्याद्यप्रतिषिद्धमपि तद्राज्ञेऽनिवेद्य लाभलोभेन विक्रीतं चेद्राजगामि मूल्यदाननिरपेक्षं तत्सर्वं पण्यं राजाऽपहरेदित्यर्थः ॥ २६१ ॥ भाषा—विक्रय वस्तु का मूल्य निर्धारित करने के कारण उस वस्तु के मूल्य का बीसवां भाग शुल्क के रूप में वसूल करे । राजा द्वारा विक्रयार्थ निषिद्ध और राजा के योग्य वस्तु बेची जाने पर भी राजा की हो जाती है ( उसका राजा अपहरण कर लेता है ) ॥ २६१ ॥ १. रक्षिता दशमांशभाक् । २. यद्राजयोग्यं ।