याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary
महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रायश्चित्ताध्यायः ४५७ भाषा—अंगुलियों की साठ, एड़ी की दो, गुल्फों की चार ( प्रत्येक पैर में दो-दो ), अरत्निका की चार और दोनों जंघों की भी उतनी ही अर्थात् चार अस्थियाँ होती हैं—॥ ८६ ॥ द्वे द्वे जानुकपोलोरुफलकांससमुद्भवे । अक्षतालूषके श्रोणीफलके च विनिर्दिशेत् ॥ ८७ ॥ किंच, जङ्घोरुसन्धिर्जानुः, कपोलो गल्लः, ऊरुः सक्थि तत्फलकं, अंसो भुजशिरः, अक्षः कर्णनेत्रयोर्मध्ये शङ्खादधोभागः, तालूषकं काकुदं, श्रोणी ककु- द्वती तत्फलकं, तेषामेकैकत्रास्थीनि द्वे द्वे विनिर्दिशेत् ; इत्येवं चतुर्दशास्थीनि भवन्ति ॥ ८७ ॥ भाषा—घुटने, कपोलों, ऊरुफलक (पट्टे), कंधा, अक्ष (कान और आँखों के मध्य का स्थान ), तालूषक और श्रोणी के फलक में प्रत्येक की दो- दो अस्थियाँ—॥ ८७ ॥ भगास्थ्येकं तथा पृष्ठे चत्वारिंशच्च पञ्च च । ग्रीवा १पञ्चदशास्थिः स्याज्जत्र्वेकैकं तथा हनुः ॥ ८८ ॥ किंच, गुह्यास्थ्येकं पृष्ठे पश्चिमभागे पञ्चचत्वारिंशदस्थीनि भवन्ति । ग्रीवा कंधरा, सा पञ्चदशास्थिः स्यात् भवेत् । वक्षोंसयोः सन्धिर्जत्रु, प्रतिजत्र्वस्थि त्वेकैकम् , हनुश्चिबुकम् , तत्राप्येकमस्थीत्येवं चतुःषष्टिः ॥ ८८ ॥ भाषा—भग की एक अस्थि, पीठ में पच्चीस और गर्दन में पन्द्रह होती हैं, प्रत्येक जत्रु ( छाती और कंधे के जोड़ ) में एक-एक तथा चिबुक में एक अस्थि होती है ॥ ८८ ॥ तन्मूले द्वे ललाटाक्षिगण्डे नासा घनास्थिका । पार्श्वकाः स्थालकैः सार्धमर्बुदैश्च द्विसप्ततिः ॥ ८९ ॥ किंच, तस्य हनोर्मूलेऽस्थिनी द्वे, ललाटं भालं अक्षि चक्षुः, गण्डः कपोला- क्षयोर्मध्यप्रदेशः, तेषां समाहारो ललाटाक्षिगण्डं, तत्र प्रत्येकमस्थियुगलम् । नासा घनसंज्ञकास्थिमती । पार्श्वकाः कक्षाधःप्रदेशसंबन्धान्यस्थीनि तदाधार- भूतानि स्थालकानि, तैः स्थालकैः अर्बुदैश्चास्थिविशेषैः सह पार्श्वका द्विस- प्ततिः । पूर्वोक्तैश्च नवभिः सार्धमेकाशीतिर्भवति ॥ ८९ ॥ भाषा—चिबुक के मूल में दो अस्थियाँ, ललाट, आँख और गण्ड (कपोल एवं आँख के बीच का भाग) में भी प्रत्येक में दो दो, नाक में घन नाम की १. पञ्चदशास्थीनि जत्र्वेव चः।