याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary
महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रायश्चित्ताध्यायः ४६३ (अस्थि की) एक अञ्जलि होती है तथा मस्तक में आधी अञ्जलि मज्जा होती है । श्लेष्म का सार भी उतना ही (आधी अञ्जलि) होता है और वीर्य भी उतना ही (आधी अञ्जलि) होता है । इस प्रकार निर्मित यह शरीर अस्थिर है ऐसी मति वाला व्यक्ति ही मोक्ष-प्राप्ति में समर्थ होता है ॥ १०५-१०७ ॥ उपासनीयात्मस्वरूपमाह- द्वासप्ततिसहस्राणि हृदयादभिनिःसृताः । १हिताहिता नाम नाड्यस्तासां मध्ये शशिप्रभम् ॥ १०८ ॥ मण्डलं तस्य मध्यस्थ आत्मा दीप इवाचलः । स ज्ञेयस्तं विदित्वेह पुनराजायते न तु ॥ १०९ ॥ हृदयप्रदेशादभिनिःसृताः कदम्बकुसुमकेसरवत्सर्वतो निर्गता हिताहित- करत्वेन हिताहितेतिसंज्ञा द्वासप्ततिसहस्राणि नाड्यो भवन्ति । अपरास्तिस्रो नाड्यस्तासामिडापिङ्गलाख्ये द्वे नाड्यौ सव्यदक्षिणपार्श्वगते हृदि विपर्यस्ते नासा- विवरसंबद्धे प्रागापानायतने । सुषुम्नाख्या पुनस्तृतीया दण्डवन्मध्ये ब्रह्मरन्ध्र- विनिर्गता । तासां नाडीनां मध्ये मण्डलं चन्द्रप्रभं तस्मिन्नात्मा निर्वातस्थदीप इवाचलः प्रकाशमान आस्ते स एवंभूतो ज्ञातव्यः । यतस्तत्साक्षात्कारणा- द्विह संसारे न पुनः संसरति अमृतत्वं प्राप्नोति ॥ १०८-१०९ ॥ भाषा-हृदयप्रदेश से निकली हुई हित और अहित नामकी बहत्तर सहस्र नाडियां होती हैं और इड़ा, पिङ्गला और सुषुम्ना नाम की तीन नाड़ियां हैं, इन सभी नाड़ियों के बीच चन्द्रमा के प्रकाश के समान ज्योति से प्रकाशित मण्डल है; उसके बीच में आत्मा दीपक के समान अचल होकर स्थित रहता है । उस आत्मा का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए । उसे जानने पर मनुष्य पुनः इस संसार में जन्म नहीं लेता ॥ १०८-१०९ ॥ ज्ञेयं चारण्यकमहं यदादित्यादवाप्तवान् । योगशास्त्रं च मत्प्रोक्तं ज्ञेयं योगमभीप्सता ॥ ११० ॥ किंच, चित्तवृत्तेर्विषयान्तरतिरस्कारेणात्मनि स्थैर्यं योगस्तत्प्राप्त्यर्थं बृहदार- ण्यकाख्यमादित्याद्यन्मया प्राप्तं तच्च ज्ञातव्यम् । तथा यन्मयोक्तं योगशास्त्रं तदपि ज्ञातव्यम् ॥ ११० ॥ भाषा-(चित्तवृत्ति के निरोध के लिए) 'बृहदारण्यक' का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए, जो मैंने सूर्य देवता से पाया है; और योग की इच्छा रखने वाले को मेरा रचा हुआ योगशास्त्र जानना चाहिए ॥ ११० ॥ १. हिता नाम हि ता नाड्यः ।