भारतकोश
याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary

महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished782 पृष्ठ

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प्रायश्चित्ताध्यायः ४७३ एवमविद्याविद्धोऽयमात्मा रजस्तमोभ्यां सम्यगाविष्ट इह संसारे पर्यटन् नानाविधदुःखप्रदैर्भावैरभिभूतः पुनः पुनः संसारं देहग्रहणं प्राप्नोतीति । ईश्वरः स कथं भावैरनिष्टैः संप्रयुज्यत इत्यस्य चोद्यस्यानवकाशः ॥ १४० ॥ भाषा—( इस प्रकार अविद्या से युक्त ) यह आत्मा रजोगुण एवं तमो- गुण से पूर्णतः आविष्ट होकर इस लोक में भटकता हुआ, अनेक दुःखप्रद भावों से युक्त होकर पुनः पुनः संसार में आता है अर्थात् शरीर धारण करता है ॥ १४० ॥ यदपि 'करणैरन्वितस्यापि' ( प्रा० १३० ) इति द्वितीयं चोद्यं तस्योत्तर- माह— मलिनो हि यथाऽऽदर्शो रूपालोकस्य न क्षमः । तथाऽविपक्वकरण आत्मज्ञानस्य न क्षमः ॥ १४१ ॥ यद्यप्यात्मा अन्तःकरणादिज्ञानसाधनसंपन्नस्तथापि जन्मान्तरानुभूतार्थव- बोधे न समर्थः अविपक्वकरणो रागादिमलाक्रान्तचित्तो यस्मात् ; यथा दर्पणो मलच्छन्नो रूपज्ञानोत्पादनसमर्थो न भवति ॥ १४१ ॥ भाषा—( दूसरे प्रश्न का उत्तर देते हैं— ) जिस प्रकार मलिन दर्पण रूप का ज्ञान कराने में समर्थ नहीं होता, उसी प्रकार आत्मा राग आदि दोष से युक्त होने के कारण दूसरे जन्म के अनुभवों का ज्ञान प्राप्त करने में असमर्थ रहता है ॥ १४१ ॥ ननु प्राग्भवीयज्ञानस्याप्यात्मप्रकाशत्वात् तस्य च स्वतःसिद्धत्वान्नानुपलम्भो युक्त इत्याशङ्क्याह— कट्ट्वेर्वारौ यथाऽपक्वे मधुरः सन्नसोऽपि न । प्राप्यते ह्यात्मनि तथा नापक्वकरणे ज्ञता ॥ १४२ ॥ अपक्वे कट्ट्वेर्वारौ तिक्तकर्कटिकायां विद्यमानोऽपि मधुरो रसो यथा नोप- लभ्यते तथात्मन्यपक्वकरणे विद्यमानापि ज्ञता ज्ञातृता प्राग्भवीयवस्तुगोचरा न ज्ञाप्यते ॥ १४२ ॥ भाषा—जिस प्रकार कडुई ककड़ी में रस होने पर भी वह बिना पके प्राप्त नहीं होता, उसी प्रकार आत्मा में ज्ञान रहते हुए भी अपक्वकरण की अवस्था में (रागादि विकारों से चित्त के मलिन रहने पर) उसे पूर्व- जन्म के अनुभव का ज्ञान नहीं हो पाता ॥ १४२ ॥ १. अन्तःकरणादेर्ज्ञान । २ कट्ट्वार्वा ।