भारतकोश
याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary

महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished782 पृष्ठ

पृष्ठ 531, कुल 782 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 531

प्रायश्चित्ताध्यायः ४७५ भाषा—ब्रह्म ( आत्मा ), आकाश, वायु, तेज, अग्नि, जल और पृथिवी ये ( शरीर को व्याप्त कर धारण करने के कारण ) धातु कहे जाते हैं। ये ही ( आकाश आदि अवलोकित होने के कारण ) लोक ( या जड़ ) हैं और यह ज्ञानमय आत्मा होता है; इन्हीं के समुदाय से चर और अचर संसार की उत्पत्ति होती है ॥ १४५ ॥ कथमसावात्मा जगत्सृजतीत्याह— मृद्दण्डचक्रसंयोगात्कुम्भकारो यथा घटम् । करोति तृणमृत्काष्ठैर्गृहं वा गृहकारकः ॥ १४६ ॥ हेममात्रमुपादाय रूपं वा हेमकारकः । निजलालासमायोगात्कोशं वा कोशकारकः ॥ १४७ ॥ कारणान्येवमादाय तासु तास्विह योनिषु । सृजंत्यात्मानमात्मा च संभूय करणानि च ॥ १४८ ॥ यथा हि कुलालो मृच्चक्रचीवरादिकं कारणजातमुपादाय करकशरावादिकं नानाविधकार्यजातं रचयति, यथा वा वर्धकिस्तृणमृत्काष्ठैः परस्परसापेक्षैः एकं गृहाख्यं कार्यं करोति, यथा वा हेमकारः केवलं हेमोपादाय हेमानुगतमेव कटक- मुकुटकुण्डलादिकार्यमुत्पादयति, यथा वा कोशकारकः कीटविशेषो निजलाल- यारब्धमात्मबन्धनं कोशाख्यमारभते, तथात्मापि पृथिव्यादीनि साधनानि परस्परसापेक्षाणि, तथा करणान्यपि श्रोत्रादीन्युपादाय अस्मिन्संसारे तासु तासु सुरादियोनिषु स्वयमेवात्मानं निजकर्मबन्धबद्धं शरीरितया सृजति ॥ १४६-१४८॥ भाषा—जिस प्रकार कुम्हार मिट्टी, डंडे और चाक के संयोग से घड़ा बनाता है; घर बनाने वाला तिनकों, मिट्टी और लकड़ी से घर बना देता है अथवा जिस प्रकार स्वर्णकार केवल सोना लेकर उससे अनेक प्रकार के रूप ( आभूषण आदि ) बना डालता है अथवा जिस प्रकार अपनी ही लार से मकड़ी अपना जाला बना लेती है उसी प्रकार आत्मा भी पृथिवी आदि साधनों और श्रोत्र आदि इन्द्रियों को लेकर स्वयं ही इस संसार में भिन्न- भिन्न योनियों में शरीरी के रूप में अपनी रचना करता है ॥ १४६-१४८ ॥ किं पुनर्वैषयिकज्ञानेन्द्रियव्यतिरिक्तात्मसद्भावे प्रमाणमित्याशङ्कयाह— महाभूतानि सत्यानि यथात्मापि तथैव हि । कोऽन्यथैकेन नेत्रेण दृष्टमन्येन पश्यति ॥ १४९ ॥ वाचं वा को विजानाति पुनः संश्रुत्य संश्रुताम् । १. सृजत्यात्मानमात्मैव ।