याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary
महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 533, कुल 782 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रायश्चित्ताध्यायः ४७७ योऽसौ पूर्वोक्त आत्मा विप्लुतॊऽहंकारदूषितः स सकलकर्मसु फलमस्ति न वेति संदिग्धमतिर्भवति । तथाऽसिद्धोऽप्यकृतार्थोऽपि सिद्धमेव कृतार्थमात्मानं मन्यते ॥ १५२ ॥ भाषा—यह आत्मा अहंकार से दूषित होकर शङ्का करने लगता है कि सभी कर्मों का फल होता है या नहीं, और अकृतार्थ होते हुए भी अपने को कृतार्थ मानने लगता है ॥ १५२ ॥ मम दाराः सुतामात्या अहमेषामिति स्थितिः । हिताहितेषु भावेषु विपरीतमतिः सदा ॥ १५३ ॥ किंच, तस्य विप्लुतमतेर्मम कलत्रपुत्रप्रेष्यादयोऽहमेषामित्यतीव मम- ताकुलस्थितिर्भवति । तथा हिताहितकरे कार्यप्रकारे स विप्लुतमतिर्विप- रीतमतिः सदा भवेत् ॥ १५३ ॥ भाषा—उसकी (अहंकार से दूषित आत्मा की) 'ये मेरी पत्नी है' 'ये मेरे पुत्र हैं' 'ये मेरे सेवक हैं' 'मैं इनका हूँ' ऐसी ममताकुल दशा होती है, तथा हित एवं अहित के कार्यों में उसकी सदैव विपरीत बुद्धि होती है ॥ १५३ ॥ १ज्ञेयज्ञे प्रकृतौ चैव विकारे चाविशेषवान् । २अनाशकानलाघातजलप्रपतनोधमी ॥ १५४ ॥ एवंवृत्तोऽविनीतात्मा वितथाभिनिवेशवान् । कर्मणा द्वेषमोहाभ्यामिच्छया चैव बध्यते ॥ १५५ ॥ किंच, ज्ञेयं जानातीति ज्ञेयज्ञस्तस्मिन्नात्मनि प्रकृतौ चात्मनो गुणसाम्याव- स्थायां विकारे चाहंकारादावविशेषवान् विवेका नभिज्ञो भवति । तथाऽनश- नहुताशनाम्बुप्रवेशविषनाशनादिषु विप्लववशात्कृतप्रयत्नो भवेत् । एवं नानाप्रका- राकार्यप्रवृत्तोऽविनीतात्माऽसंवतात्मा असत्कार्याभिनिवेशयुक्तः सन् तत्कृतकर्म- जातेन रागद्वेषाभ्यां मोहेन च बध्यते ॥ १५४-१५५ ॥ भाषा—ज्ञेयज्ञ (ज्ञेय विषयों को जानने वाला) आत्मा प्रकृति में (अपने गुणों की साम्यावस्था में) अहंकारादि विकार से विवेकशून्य हो जाता है और भोजन-त्याग, अग्नि, जल में प्रवेश अथवा गिरकर मरने के कार्य में यत्न करता है। इस प्रकार अनेक कार्यों में प्रवृत्त असंयत आत्मा दुष्कर्म में लगकर (उन कर्मों से उत्पन्न) राग, द्वेष और मोह से पीडित होता है ॥ १५४-१५५ ॥ १. ज्ञेये च प्रकृतौ विकारे चावि । २. अनाशकानलापात ।