भारतकोश
याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary

महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished782 पृष्ठ

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प्रायश्चित्ताध्यायः ४७६ इन उपायों द्वारा सम्यक् रूप से शुद्ध और केवल सत्त्वगुण सम्पन्न व्यक्ति ही मुक्ति प्राप्त करता है ॥ १५६-१५९ ॥ कथममृतत्वप्राप्तिरित्यत आह— तत्त्वस्मृतेरुपस्थानात्सत्त्वयोगात्परिक्षयात् । कर्मणां संनिकर्षाच्च सतां योगः प्रवर्तते ॥ १६० ॥ आत्माख्यतत्त्वस्मृतेरात्मनि निश्चलतयोपस्थानात् सत्त्वशुद्धियोगात्केवलस- त्त्वगुणयोगात्कर्मबीजानां परिक्षयात् सत्पुरुषाणां च संबन्धात् आत्मयोगः प्रवर्तते ॥ १६० ॥ भाषा—आत्मा नाम के तत्त्व का सदा स्मरण करने, आत्मा में निश्चल होकर ध्यान लगाने, केवल सत्त्वगुण के योग से, कर्मरूपी बीज के नष्ट होने से और सत्पुरुषों के संयोग से आत्मयोग प्राप्त होता है ॥ १६० ॥ शरीरसंक्षये यस्य मनः सत्त्वस्थमीश्वरम् । अविप्लुतमतिः सम्यक्सं जातिस्मरतामियात् ॥ १६१ ॥ किंच, यस्य पुनर्यौगिनोऽविप्लुतमतेः शरीरसंक्षयसमये मनः सत्त्वयुक्तं सम्यगेकाग्रतयेश्वरं प्रति व्याप्रीयते स यद्युपासनाप्रयोगप्रवीणतयात्मानं नाधि- गच्छति तर्हि विशिष्टसंस्कारपाटववशेन जात्यन्तरानुभूतकृमिकीटादिनानागर्भ- वासादिउद्भूतदुःखस्मरणं प्राप्नुयात् । तत्स्मरणेन च जातोद्वेगतस्तद्विच्छेद- कारिणि मोक्षे प्रवर्तते ॥ १६१ ॥ भाषा—शरीर-त्याग के समय जिस अविप्लुतमति (अहंकार आदि से जिसकी बुद्धि मलिन नहीं है उस) योगी का मन सत्त्वगुण से युक्त होकर सम्यक् रूप से केवल ईश्वर में लगा होता है वह यदि आत्मा का साक्षात्कार नहीं कर पाता तो भी उसे पिछले जन्म में अनुभूत दुःखों की स्मृति रहती है (जिससे वह मोक्षप्राप्ति के लिए प्रवृत्त होता है) ॥ १६१ ॥ यस्त्वल्पटुसंस्कारतया पूर्वा जातिं न स्मरति तस्य का गतिरित्यत्राह— यथा हि भरतो वर्णैर्वर्णयत्यात्मनस्तनुम् । नानारूपाणि कुर्वाणस्तथात्मा कर्मजास्तनूः ॥ १६२ ॥ भरतो नटः, स यथा रामरावणादिनानारूपाणि कुर्वाणः सितासितपीता- दिभिर्वर्णैरात्मनस्तनुं वर्णयति रचयति तथैवात्मा तत्तत्कर्मफलोपभोगार्थं कुब्ज- वामनादिनानारूपाणि कर्मनिमित्तानि कलेवराण्यादत्ते ॥ १६२ ॥ १. अविप्लुतस्मृतिः सम्यग्जाति। २. संस्मरतामियात् । ३. यस्त्वयं दुःसंस्कार।