याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary
महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished782 पृष्ठ
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पद्यार्धानुक्रमणिका ७०७
| श्लोकाः | पृष्ठम् | श्लोकः | पृष्ठम् |
|---|---|---|---|
| तथा शक्तः प्रतिभुवं | ३४३ | ताम्रकास्फटिकाद्रक्त | १३५ |
| तथाश्वमेधावभृथ | ५१८ | तामिस्रं लोहशङ्कुं च | ५०० |
| तथैव परिपाल्योऽसौ | १५१ | तारानक्षत्रसंचारैः | ४८२ |
| तथैवानाश्रमे वाचः | ५०९ | तालजङ्घाप्रयासेन | ४६५ |
| तथोपनिधिराजज्ञी | १८९ | तालुस्थाचलजिह्वश्च | ४८९ |
| तद्वदत्समवाप्नोति | ९५ | तालूदरं बस्तिशीर्षं | ४५९ |
| तदङ्गं रसरूपेण | ४५१ | तावन्त एव मुनयः | ४८७ |
| तदन्नं विकरेद्भूमौ | १०९ | तावद्गौः पृथिवी ज्ञेया | ९३ |
| तदभावेऽस्य तनये | १८ | तित्तिरौ तु तिलद्रोणं | ५७३ |
| तदर्धं मध्यमः प्रोक्तः | १६१ | तिथिवृद्ध्या चरेत्पिण्डान् | ६३३ |
| तदवाप्य नृपो दण्डं | १५६ | तिलौदनरसक्षारान् | ४२२ |
| तदहर्न प्रदुष्येत | ४०८ | तिस्रो वर्णानुपूर्व्येण | २३ |
| तन्निमित्तं क्षतः शस्त्रैः | ५२० | तुलाग्न्यापो विषं कोशौ | २४३ |
| तन्मन्त्रस्य च भेत्तारं | ३८८ | तुलाधारणविद्वद्भिः | २४८ |
| तन्मात्रादीन्यहंकारात् | ४८४ | तुलापुरुष इत्येषः | ६३१ |
| तन्मूले द्वे ललाटाक्षि | ४५७ | तुलाशासनमानानां | ३५६ |
| तन्मूल्याद् द्विगुणो दण्डो | ३५३ | तुला स्त्रीबालवृद्धान्ध | २४५ |
| तपसश्च परस्येह | १७ | तूष्णीमेताः क्रियाः स्त्रीणां | ७ |
| तपसा ब्रह्मचर्येण | ४८७ | तृणगुल्मलतात्वं च | ४९२ |
| तपस्तप्त्वाऽसृजद्ब्रह्मा | ९० | तृप्त्यर्थं पितृदेवानां | ९० |
| तपस्विनो दानशीलाः | २२३ | ते तृप्तास्तर्पयन्त्येनं | १७ |
| तपो वेदविदां क्षान्तिः | ४२९ | तेन त्वामभिषिञ्चामि | १२९ |
| तप्तक्षीरघृताम्बूनाम् | ६२७ | तेन देवशरीराणि | ४८१ |
| तप्तेऽयःशयने सार्धं | ५३९ | तेनाग्निहोत्रिणो यान्ति | ४८६ |
| तमायान्तं पुनर्जत्त्वा | ३९० | तेनोपसृष्टो यस्तस्य | १२७ |
| तमेव कृत्स्नमाप्नोति | १५१ | तेनोपसृष्टो लभते | १२७ |
| तरिकः स्थलजं शुल्कं | ३६५ | तेऽपि तेनैव मार्गेण | ४८६ |
| तवाहंवादिनं क्लीबं | १४६ | तेभ्यः क्रियापराः श्रेष्ठाः | ९० |
| तस्मात्तु नृपतेरर्धं | १५० | तेऽष्टौ लिङ्गा तु तास्तिस्रो | १५९ |
| तस्मात्तेनेह कर्तव्यं | ४९७ | तैलहस्तैलपायी स्यात् | ४९४ |
| तस्माद्भातृनृपयज्ञः | ४६७ | तैश्चापि संयतैर्भाव्यं | १०१ |
| तस्मादस्ति परो देहात् | ४८३ | तैः सार्धं चिन्तयेद्राज्यं | १४१ |
| तस्य वृत्तं कुलं शीलं | ४३५ | त्यजन्दाप्यस्तुतीयांशम् | ३० |
| तस्य षोढा शरीराणि | ४५१ | त्यागः परिग्रहाणां च | ४७८ |
| तस्याप्यन्नं सोदकुम्भं | ११८ | त्रपुसीसकताम्राणां | ८५ |
| तस्येत्युक्तवतो लौहं | २५४ | त्रयो लप्तास्तु विज्ञेयाः | ४६१ |
| तस्यैतदात्मजं सर्वम् | ४५३ | त्रायस्वास्मादभीशापात् | २५९ |
| ४५ या० |