याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary
महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished782 पृष्ठ
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७२० याज्ञवल्क्यस्मृतिः
| श्लोकाः | पृष्ठम् | श्लोकाः | पृष्ठम् |
|---|---|---|---|
| वृद्धबालातुराचार्य | ६९ | शक्तोऽप्यमोचयन्स्वामी | ३८७ |
| वृद्धभारिनृपस्नात | ५२ | शक्त्या च यज्ञकृन्मोचे | ४४२ |
| वृषक्षुद्रपशूनां च | ३५४ | शतमानं तु दशभिः | १६० |
| वृष्ट्यायुःपुष्टिकामो वा | १३४ | शते दशपला वृद्धिः | ३२६ |
| वेत्ति सर्वगतां कस्मात् | ४६९ | शतं स्त्रीदूषणे दद्यात् | ३८१ |
| वेद एव द्विजातीनां | १६ | शस्यस्तदर्धिकः पाद् | ३४२ |
| वेदप्प्लावी यवाश्यब्दं | ५८७ | शं नो देवीस्तथा काण्डात् | १३६ |
| वेदमध्यापयेदेनं | ७ | शं नो देव्या पथः क्षिप्त्वा | १०३ |
| वेदं व्रतानि वा पारं | १८ | शपन्तं दापयेद्राजा | ३४१ |
| वेदार्थर्वपुराणानि | ४६ | शब्दः स्पर्शश्च रूपं च | ४८५ |
| वेदानुवचनं यज्ञो | ४८७ | शब्दादिविषयोद्योगं | ४७६ |
| वेदाभ्यासरतं शान्तं | ६२३ | शरणागतबालस्त्री | ६१३ |
| वेदार्थविज्ज्येष्ठसामा | ९८ | शरीरचिन्तां निर्वर्त्य | ४४ |
| वेदार्थानधिगच्छेच्च | ४५ | शरीरपरिसंख्यानं | ४७८ |
| वेदाः स्थानानि विद्यानां | ३ | शरीरसंचये यस्य | ४७९ |
| वेदैः शास्त्रैः सविज्ञानैः | ४८२ | शरीरेण च नात्मायं | ४८० |
| वैणाभिशस्तवाधुष्य | ७० | शशश्च मत्स्येष्वपि हि | ७७ |
| वैतानोपासनाः कार्याः | ४०५ | शस्त्रविक्रयिकर्मार | ७१ |
| वैरूप्यं मरणं वापि | ४५३ | शस्त्रावपाते गर्भस्य | ३७४ |
| वैश्यवृत्त्यापि जीवन्तो | ४३२ | शस्त्रासवमधूच्छिष्टं | ४३२ |
| वैश्यश्च धान्यधनवान् | ६४१ | शस्त्रेण तु हता ये वै | १२३ |
| वैश्यहाब्दं चरेदेतत् | ५६७ | शाकरज्जुमूलफल | ८० |
| वैश्यात्तु करणः शूद्रां | ४१ | शाकाद्रौषधिपिण्याक | ४३२ |
| वैश्या प्रतोदमादद्यात् | २५ | शातातपो वसिष्ठश्च | ३ |
| वैश्याशूद्रयोस्तु राजन्यरात् | ४१ | शास्त्राणि चिन्तयेद्बुद्ध्या | १४८ |
| व्यतीपातो गजच्छाया | ९७ | शिरःकपाली ध्वजवान् | ५१३ |
| व्यत्यये कर्मणां साम्यं | ४३ | शिराः शतानि सप्तैव | ४६० |
| व्यभिचारादृतौ शुद्धिः | २८ | शिल्पैर्वा विविधैर्जीवेत् | ५३ |
| व्यवहारान्नृपः पश्येत् | १६३ | शुक्तं पर्युषितोच्छिष्टं | ७२ |
| व्यवहारान्स्वयं पश्येत् | १५८ | शुक्रः शनैश्चरो राहुः | १३५ |
| व्यवहारांस्ततो दृष्ट्वा | १४६ | शुक्रियारण्यकजपो | ६२२ |
| व्यसनं जायते घोरं | २६२ | शुक्लाम्बरधरो नीच | ५९ |
| व्यासिद्धं राजयोग्यं च | ३६४ | शुचि गोतृप्तिकृत्तोयं | ८७ |
| व्रजन्नपि तथात्मानं | १२७ | शुद्धश्चेद्गमयोर्ध्वं मां | ५५५ |
| श | शुद्धयेत वा मिताशित्वात् | १२५ | |
| शकस्यानौहमानस्य | २७० | शुद्धयेरन्स्त्री च शूद्रश्च | ५९ |
| शक्तितो वा यथालाभं | १३७ | शूद्रः प्रत्रजितानां च | ६५० |