भारतकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 108, कुल 421 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 108

पूर्वार्ध नौवां अध्याय करते हैं. हम आप को वायु के लिए बरतन में ग्रहण करते हैं. आप इंद्र देव के इष्टतम और इंद्र की योनि हैं. हम यजमान इंद्र देव के लिए आप को ग्रहण करते हैं. ( ३ ) ग्रहा ऽ ऊर्जाहुतयो व्यन्तो विप्राय मतिम्. तेषां विशिप्रियाणां वोहमिषमूर्ज ꣳ समग्रभमुपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा जुष्टं गृह्णाम्येष ते योनिरिन्द्राय त्वा जुष्टतमम्. सम्पृचौ स्थः सं मा भद्रेण पृङ्क्तं विपृचौ स्थो वि मा पाप्मना पृङ्क्तं.. (४) हे सोम और सोमरस के पात्रो! हम ऊर्जा पाने के लिए आप का आह्वान करते हैं. आप ब्राह्मणों की बुद्धि विस्तृत करते हैं. आप यजमानों के लिए ऊर्जस्वी रस को भलीभांति स्थापित करते हैं. हम आप दोनों को इंद्र देव के लिए उपयाम पात्र में स्थापित करते हैं. आप इंद्र देव की योनि हैं. आप दोनों इंद्र देव के अभीष्ट हैं. आप दोनों संपृक्त ( साथसाथ ) रह कर हमारा कल्याण व हमें सुख प्रदान कीजिए. आप दोनों पृथक् ( अलग ) रह कर हमें पापों से दूर करने की कृपा कीजिए. ( ४ ) इन्द्रस्य वज्रोसि वाजसास्त्वयायं वाज ꣳ सेत्. वाजस्य नु प्रसवे मातरं महीमदितिं नाम वचसा करामहे. यस्यामिदं विश्वं भुवनमाविवेश तस्यां नो देवः सविता धर्म ꣳ साविषत्.. (५) आप इंद्र देव के वज्र और अन्नमय हैं. आप से यजमान को भी अन्न प्राप्त हो. हम अपनी ( मंत्रमय ) वाणी से धरती को अन्न उपजाने के लिए प्रेरित करते हैं. पृथ्वी को देवों की माता अदिति के समान प्रेरित करते हैं. सारा संसार ( लोक ) सविता देव के वश में है. सविता हमें धार्मिक बनाएं. वे हमें गतिशील बनाने की कृपा करें. ( ५ ) अप्सवन्तरमृतमप्सु भेषजमपामुत प्रशस्तिष्वश्वा भवत वाजिनः. देवीरापो यो व ऽ ऊर्मिः प्रकूर्त्तिः ककुन्मान् वाजसास्तेनायं वाज ꣳ सेत्.. (६) जल के भीतर अमृत व ओषधियां हैं. हम उन का सेवन कर के घोड़े की तरह बलवान हो जाएं. हे जल समूह! आप की तरंगें ऊंची हैं और लहरें वेगशाली हैं. आप की ऊंचीऊंची तरंगें हमें अन्न प्रदान करने की कृपा करें. ( ६ ) वातो वा मनो वा गन्धर्वाः सप्तवि ꣳ शतिः. ते अग्रेऽश्वमयुञ्जँस्ते अस्मिञ्जवमादधुः.. (७) वायु, मन, गंधर्व आदि ने पहले ही सात से तिगुने यानी सत्ताईस घोड़े अपने साथ जोत लिए हैं. वे आगेआगे ( जल्दीजल्दी ) आ कर हमारे यज्ञ की बढ़ोतरी करने की कृपा करें. ( ७ ) वातर ꣳ हा भव वाजिन्युज्यमान ऽ इन्द्रस्येव दक्षिणः श्रियैधि. युञ्जन्तु त्वा मरुतो विश्ववेदस ऽ आ ते त्वष्टा पत्सु जवं दधातु.. (८) १०८ - यजुर्वेद