यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 128, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वार्ध ग्यारहवां अध्याय हैं. वे सूर्य की बहुत सी किरणों को प्रकाशित करते हैं. अग्नि लोक की सृष्टि करने वाले हैं. हम अग्नि को स्वर्गलोक व पृथ्वीलोक में घूमता हुआ देखते हैं. ( १७ ) आगत्य वाज्यध्वान ꣳ सर्वा मृधो विधूनुते. अग्नि ꣳ सधस्थे महति चक्षुषा नि चिकीषते.. ( १८ ) अग्नि यज्ञ को अन्नमय बनाते हैं. वे सभी मार्ग को कंपाते हुए जाते हैं. वे सधे हुए हैं. वे अपने विशाल चक्षु से यज्ञ का निरीक्षण करते हैं. ( १८ ) आक्रम्य वाजिन् पृथिवीमग्निमिच्छ रुचा त्वम्. भूम्या वृत्वाय नो ब्रूहि यतः खनेम तं वयम्.. (१९) हे वाजिन ( चेतनायुक्त ऊर्जा ) ! आप पृथ्वी पर तेजी से विचरते हैं. आप अग्नि की चाह न कीजिए ( इच्छा न करिए ). आप प्रकाशित होने और भूमि को खोद कर हमें बताने की कृपा कीजिए. ताकि हम भी उसे खोद कर ( ऊर्जस्वी पदार्थों को ) प्राप्त कर सकें. ( १९ ) द्यौस्ते पृष्ठं पृथिवी सधस्थमात्मान्तरिक्ष ꣳ समुद्रो योनिः. विख्याय चक्षुषा त्वमभि तिष्ठ पृतन्यतः.. (२०) हे वाजिन! स्वर्गलोक में आप का आधार ( पृष्ठ ) भाग है. पृथ्वी पर आप सधे हुए हैं. अंतरिक्ष में आप की आत्मा है तथा समुद्र योनि है. आप आंखों से व्याख्या करते हैं. आप राक्षसों पर आक्रमण कर के उन का विनाश कीजिए. ( २० ) उत्क्राम महते सौभागायास्मादास्थानाद् द्रविणोदा वाजिन्. वय ꣳ स्याम सुमतौ पृथिव्या ऽ अग्निं खनन्र ऽ उपस्थे अस्याः.. ( २१ ) हे वाजिन! आप धनदाता हैं. आप सौभाग्य दान करने के लिए ऊपर उठने की कृपा कीजिए. हम आप की कृपा से अच्छी मति वाले हो जाएं. हम पृथ्वी को खोदें. अग्नि को स्थापित करने की कृपा कीजिए. ( २१ ) उदक्रमीद् द्रविणोदा वाज्यर्वाकः सुलोक ꣳ सुकृतं पृथिव्याम्. ततः खनेम सुप्रतीकमग्नि ꣳ स्वो रुहाणा अधि नाकमुत्तमम्.. ( २२ ) यह घोड़ा चंचल और धनदाता है. पृथ्वी का उत्क्रमण कर के आया है. पृथ्वी पर अच्छे लोक रचे हैं. उन्हें अच्छी कृति का रूप दिया है. हम अग्नि को उत्तम सुख के लिए खोदते हैं ( जगाते हैं ). हम अच्छे सुखों के लिए उत्तम लोक का आरोहण करते हैं. ( २२ ) आ त्वा जिघर्मि मनसा घृतेन प्रतिक्षियन्तं भुवनानि विश्वा. पृथुं तिरश्चा वयसा बृहन्तं व्यचिष्ठमन्नै रभसं दृशानम्.. ( २३ ) १२८ - यजुर्वेद 632/8