भारतकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 170, कुल 421 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 170

पूर्वार्ध तेरहवां अध्याय हम विश्वव्यचा ( सूर्य ) को पश्चिम दिशा में प्रतिष्ठित करते हैं. उस से नेत्र उत्पन्न हुए. विश्वव्यचा से वर्षा ऋतु उत्पन्न हुई. वर्षा ऋतु से जगती छंद उत्पन्न हुए. उस से ऋक् व साम उत्पन्न हुए. ऋक् और साम से शुक्र ग्रह उत्पन्न हुए. शुक्र ग्रह से सप्तदश स्तोम उत्पन्न हुए. सप्तदश स्तोम से वैरूप साम का प्रादुर्भाव हुआ. इन सब के प्रमुख जमदग्नि ऋषि हैं. प्रजापति से लिए गए सहयोग से हम प्रजाओं के लिए नेत्र ग्रहण करते हैं. ( ५६ ) इदमुत्तरात् स्वस्तस्य श्रोत्र १५ सौव १५ शरच्छ्रौत्र्यनुष्टुप् शारद्यनुष्टुभ ऽ ऐड मैडान्मन्थी मन्थिन ऽ एकवि १५ श ऽ एकवि १५ शाद्वैराजं विश्वामित्र ऽ ऋषिः प्रजापतिगृहीतया त्वया श्रोत्रं गृह्णामि प्रजाभ्यः.. (५७) उत्तर दिशा में श्रोत्र प्रमुख साधन हैं. श्रोत्र से शरद की उत्पत्ति होती है. शरद से अनुष्टुप् छंद उत्पन्न हुआ. अनुष्टुप् से एडसाम की उत्पत्ति हुई. एडसाम से मंधी उत्पन्न हुआ. मंथी से एकविंश स्तोम की उत्पत्ति हुई. एकविंश से वैराज साम उत्पन्न हुआ. इन सब के प्रमुख विश्वामित्र ऋषि हैं. प्रजापति से लिए गए सहयोग से हम प्रजाओं के लिए श्रोत्र को ग्रहण करते हैं. ( ५७ ) इयमुपरि मतिस्तस्यै वाङ्मात्या हेमन्तो वाच्यः पङ्कितहैमन्ती पङ्क्त्यै निधनवन्निधनवत ऽ आग्रयण ऽ आग्रयणात् त्रिणवत्रयस्त्रि १५ शौ त्रिणवत्रयस्त्रि १५ शाभ्या १५ शाक्वररैवते विश्वकर्म ऽ ऋषिः प्रजापतिगृहीतया त्वया वाचं गृह्णामि प्रजाभ्यो लोकं ता ऽ इन्द्रम्.. (५८) सब से ऊपर मति प्रतिष्ठित है. उसी का मति से मनन करते हुए इस की प्रतिष्ठा करते हैं. वाणी से हेमंत ऋतु उत्पन्न हुई. हेमंत से पंक्ति छंद की उत्पत्ति हुई. पंक्ति से निधनवत साम उत्पन्न हुआ. निधनवत साम से आग्रयण उत्पन्न हुआ आग्रयण से त्रिणव की उत्पत्ति हुई. आग्रयण से त्रयस्त्रिंश की उत्पत्ति हुई. त्रिणव और त्रयस्त्रिंश से शाक्वर और रैवत साम उत्पन्न हुए. इन सब के प्रमुख विश्वकर्मा ऋषि हैं. प्रजापति से लिए गए सहयोग से हम प्रजाओं के लिए वाणी को ग्रहण करते हैं. प्रजा के लिए स्तोत्र गान करते हुए हम इंद्र देव का आह्वान करते हैं. ( ५८ ) १७० - यजुर्वेद

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित) · पृष्ठ 170, कुल 421 में से · BharatKosha