भारतकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

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पृष्ठ 186

पूर्वार्ध पंद्रहवां अध्याय अयं पश्चाद्विश्वव्यचास्तस्य रथप्रोतश्चासमरथश्च सेनानीग्रामण्यौ. प्रम्लोचन्ती चानुम्लोचन्ती चाप्सरसौ व्याघ्रा हेतिः सर्पाः प्रहेतिस्तेभ्यो नमो अस्तु ते नोवन्तु ते नो मृडयन्तु ते यं द्विष्मो यश्च नो द्वेष्टि तमेषां जम्भे दध्मः.. (१७) आदित्य देव सब को प्रकाशित करते हैं. आदित्य देव को पश्चिम दिशा में स्थापित करते हैं. आदित्य देव रथवान, सेनानी, ग्राम रक्षक व अग्रणी हैं. प्रम्लोचन तथा अनुलोचनी इन की दो अप्सराएं हैं. व्याघ्र पशु इन के आयुध हैं. सांप आदि तीखे शस्त्र हैं. आदित्य देव को नमन करते हैं. अग्नि हमारी रक्षा करें. अग्नि हमें सुख प्रदान करें. जो हम से द्वेष करते हैं और जिन से हम द्वेष करते हैं, उन सब को अग्नि अपने जबड़े में धारने की कृपा करें. (१७) अयमुत्तरात्संयद्वसुस्तस्य तार्क्ष्यश्चारिष्टनेमिश्च सेनानीग्रामण्यौ. विश्वाची च घृताची चाप्सरसावापो हेतिर्वातः प्रहेतिस्तेभ्यो नमो अस्तु ते नोवन्तु ते नो मृडयन्तु ते यं द्विष्मो यश्च नो द्वेष्टि तमेषां जम्भे दध्मः.. (१८) यह इष्टका देव उत्तर दिशा में प्रतिष्ठित, धन स्वरूप व यज्ञ स्वरूप हैं. इन के हथियार तीक्ष्ण व शत्रुनाशक व अस्त्रशस्त्र विस्तारक हैं. वे अपराजित हैं. वे विश्वपालक व ग्राम पालक हैं. अग्रणी इन की विश्वाची तथा घृताची नामक दो अप्सराएं हैं. जल इन के आयुध हैं. वायु इन के तीक्ष्ण हथियार हैं. अग्नि हमें सुख प्रदान करें. जो हम से द्वेष करते हैं और जिन से हम द्वेष करते हैं, उन सब को अग्नि अपने जबड़े में धारने की कृपा करें. (१८) अयमुपर्यर्वाग्वसुस्तस्य सेनजिच्च सुषेणश्च सेनानीग्रामण्यौ. उर्वशी च पूर्वचित्तिश्चाप्सरसाववस्फूर्जन् हेतिर्विद्युत्प्रहेतिस्तेभ्यो नमो अस्तु ते नोवन्तु ते नो मृडयन्तु ते यं द्विष्मो यश्च नो द्वेष्टि तमेषां जम्भे दध्मः.. (१९) यह ऊपर मध्य दिशा में बादल देव हैं. यह देव विजेता, अच्छी सेना वाले, सेनानी, ग्राम प्रमुख व अग्रणी हैं. उर्वशी तथा पूर्वचिति इन की दो अप्सराएं हैं. गर्जना इन के शस्त्र हैं. बिजली इन का तीक्ष्ण आयुध है. अग्नि हमें सुख प्रदान करें. जो हम से द्वेष करते हैं और जिन से हम द्वेष करते हैं, उन सब को अग्नि अपने जबड़े में धारने की कृपा करें. (१९) अग्निर्मूर्धा दिवः ककुत्पतिः पृथिव्या ऽ अयम्. अपा ६४ रेता ६४ सि जिन्वति.. (२०) अग्नि मूर्धन्य और स्वर्गलोक के स्वामी हैं. पृथ्वी रक्षक हैं. अग्नि जल के रस को पोषित करते हैं. (२०) अयमग्निः सहस्रिणो वाजस्य शतिनस्पतिः. मूर्धा कवी रणीयाम्.. (२१) १८६ - यजुर्वेद