भारतकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

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पृष्ठ 194

पूर्वार्ध पंद्रहवां अध्याय परमेष्ठी त्वा सादयतु दिवस्पृष्ठे व्यचस्वतीं प्रथस्वतीं दिवं यच्छ दिवं दृ १७ ह दिवं मा हि १७ सीः. विश्वस्मै प्राणायापानाय व्यानायोदानाय प्रतिष्ठायै चरित्राय. सूर्यस्त्वाभि पातु मह्या स्वस्त्या छर्दिषा शन्तमेन तया देवतयाऽङ्गिरस्वद् ध्रुवे सीदतम्.. (६४) आप परम इष्ट हैं. आप विराजिए. आप स्वर्गलोक में स्थापित होइए. आप हमें भी स्वर्गलोक दीजिए. आप हिंसा मत कीजिए. सारे विश्व के लिए प्राण, अपान, व्यान, उदान की प्रतिष्ठा के लिए कृपा कीजिए. सूर्य हमारे चरित्र की रक्षा करने की कृपा करें. आप हमारे कल्याणकारी गुणों को बनाए रखिए. आप अंगिरा ऋषि की तरह ध्रुव रहिए. आप अंगिरा ऋषि की तरह प्रतिष्ठित रहिए. ( ६४ ) सहस्रस्य प्रमासि सहस्रस्य प्रतिमासि सहस्रस्योन्मासि साहसोसि सहस्राय त्वा.. (६५) हे अग्नि! आप हजार का मापदंड हैं. आप हजार की प्रतिमा और हजार स्थानों पर विराजनीय हैं. हम हजारों उच्चगति के लिए आप की उपासना करते हैं. ( ६५ ) १९४ - यजुर्वेद