यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 212, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वार्ध सत्रहवां अध्याय परो दिवा पर ऽ एना पृथिव्या परो देवेभिरसुरैर्यदस्ति. क १७ स्विद् गर्भं प्रथमं दध्र ऽ आपो यत्र देवाः समपश्यन्त पूर्वे.. (२९) वह परम तत्त्व स्वर्गलोक से परे है. वह परम तत्त्व पृथ्वीलोक व देवताओं से परे है. वह परम तत्त्व असुरों से परे है. जलों ने पहले गर्भ में किसे धारण किया ? जहां देवगण पहले उन्हें देखते हैं. ( २९ ) तमिद्गर्भं प्रथमं दध्र ऽ आपो यत्र देवाः समगच्छन्त विश्वे. अजस्य नाभावध्येकमर्पितं यस्मिन् विश्वानि भुवनानि तस्थुः.. (३०) वह परम तत्त्व सभी देवताओं का आश्रय है. सभी उस परम तत्त्व को प्राप्त होते हैं. उस परम तत्त्व ने सर्वप्रथम जल को अपने गर्भ में धारण किया. परमतत्त्व के नाभि में एक ही परम तत्त्व अधिष्ठित है, जिस में सारे भुवन स्थिर होते हैं. ( ३० ) न तं विदाथ य ऽ इमा जजानान्यद्युष्माकमन्तरं बभूव. नीहारेण प्रावृता जल्प्या चासुतृप ऽ उक्थशासश्चरन्ति.. (३१) उस परम तत्त्व ने सर्वप्रथम ब्रह्मांड को रचा. उसे आप और हम लोग नहीं जानते. वह सब में है भी तथा सब से अलग भी है. कोहरे से ढके बादल की तरह लोग उस परम तत्त्व के बारे में विविध व्यर्थ धारणाओं ( भ्रांतियों ) से ग्रसित रहते हैं. उस की स्तुति नहीं कर पाते. ( ३१ ) विश्वकर्मा ह्याजनिष्ट देव ऽ आदिद्गन्धर्वो अभवद् द्वितीयः. तृतीयः पिता जनितौषधीनामपां गर्भं व्यदधात् पुरुत्रा.. (३२) सर्वप्रथम विश्व का निर्माण करने वाले देवता पृथ्वी पर आए. तत्पश्चात पृथ्वी पर आदि गंधर्व हुए. पृथ्वी पालक ओषधियों में जल उपजाने वाले तीसरे क्रम में हुए. प्रथम रक्षक सभी जलों के गर्भ को विविध रूपों में धारता है. ( ३२ ) आशुः शिशानो वृषभो न भीमो घनाघनः क्षोभणश्चर्षणीनाम्. संक्रन्दनो ऽ निमिषएकवीरः शत १७ सेना ऽ अजयत् साकमिन्द्रः.. (३३) इंद्र देव शीघ्रता से शत्रुओं पर हमला करने वाले हैं. बैल जैसे बलवान हैं. घनघोर गर्जना करने वाले हैं. शत्रुओं के लिए क्षोभकारी हैं. पल भर में शत्रुओं को हराने वाले हैं. इंद्र देव अकेले ही ऐसे वीर हैं, जो सैकड़ों शत्रुओं की सेना को एक साथ जीत लेते हैं. ( ३३ ) संक्रन्दनेनानिमिषेण जिष्णुना युत्कारेण दुश्च्यवनेन धृष्णुना. तदिन्द्रेण जयत तत्सहध्वं युधो नर ऽ इषुहस्तेन वृष्णा.. (३४) गर्जना से पल भर में शत्रुओं को जीतने वाले हैं. आक्रमण के विविध तरीकों से शीघ्र ही युद्ध में तैयार होने वाले हैं. संगठित शत्रुओं को भी जीतने वाले हैं. इंद्र २१२ - यजुर्वेद