यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 233, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वार्ध अठारहवां अध्याय गंधर्व सुपर्ण रूप व यज्ञ स्वरूप हैं. भोज्य पदार्थों के दाता हैं. गंधर्व ब्राह्मणों व क्षत्रियों की रक्षा करने की कृपा करें. स्तुति नामक दक्षिणा यज्ञ की अप्सरा हैं. उन के लिए यह आहुति समर्पित है. उन के लिए स्वाहा. ( ४२ ) प्रजापतिर्विश्वकर्मा मनो गन्धर्वस्तस्य ऋक्सामान्यप्सरस ऽ एष्टयो नाम. स न ऽ इदं ब्रह्म क्षत्रं पातु तस्मै स्वाहा वाट् ताभ्यः स्वाहा.. (४३) गंधर्व प्रजापति, विश्वकर्मा व मन स्वरूप हैं. गंधर्व ब्राह्मणों व क्षत्रियों की रक्षा करने की कृपा करें. ऋक् और साम की एष्टि नामक अप्सरा है. वे हमारी रक्षा करने की कृपा करें. उन के लिए यह आहुति अर्पित है. उन के लिए स्वाहा. ( ४३ ) स नो भुवनस्य पते प्रजापते यस्य त ऽ उपरि गृहा यस्य वेह. अस्मै ब्रह्मणेस्मै क्षत्राय महि शर्म यच्छ स्वाहा.. (४४) हे प्रजापति! आप भुवनपति हैं. ऊपर के सारे घर आप की ही कृपा से स्थित हैं. आप ब्राह्मणों व क्षत्रियों को सुख प्रदान कीजिए. आप के लिए स्वाहा. ( ४४ ) समुद्रोसि नभस्वानार्द्रदानुः शम्भूर्म्मयोभूरभि मा वाहि स्वाहा. मारुतोसि मरुतां गणः शम्भूर्म्मयोभूरभि मा वाहि स्वाहावस्यूरसि दुवस्वाञ्छम्भूर्म्मयोभूरभि मा वाहि स्वाहा.. (४५) आप समुद्र, नभवान, जल दान करने वाले व भूमि को सुख दान करने वाले हैं. आप के लिए स्वाहा. मरुत् हैं. मरुतों के गण हैं. सुखदायी हैं. सब के आश्रयदाता हैं. दुःख दूर करने वाले हैं. आप बहुत सुखदायी हैं. आप के लिए यह आहुति अर्पित है. आप के लिए स्वाहा. ( ४५ ) यास्ते अग्ने सूर्ये रुचो दिवमातन्वन्ति रश्मिभिः. ताभिर्नो अद्य सर्वाभी रुचे जनाय नस्कृधि.. (४६) हे अग्नि! आप से सूर्य स्वर्गलोक को चमकाते हैं. सूर्य की किरणें स्वर्गलोक को चमकाती हैं. उन देव की किरणें आज सभी को चमकाएं व प्रकाशित करें. सभी को तेजस्वी बनाने के लिए प्रकाशित हों. ( ४६ ) या वो देवाः सूर्ये रुचो गोष्वश्वेषु या रुचः. इन्द्राग्नी ताभिः सर्वाभी रुचन्नो धत्त बृहस्पते.. (४७) जो देवगण सूर्य के प्रकाश से ज्योतिमान हैं, जो प्रकाश गायों में विद्यमान है, जो प्रकाश घोड़ों में विद्यमान है, इंद्र देव उन से हम सभी को चमकाएं. इंद्र देव उसे हम सभी के लिए धारण करें. अग्नि व बृहस्पति व उसे हम सभी के लिए धारण करें. ( ४७ ) रुचन्नो धेहि ब्राह्मणेषु रुच १७ राजसु नस्कृधि. रुचं विश्येषु शूद्रेषु मयि धेहि रुचा रुचम्.. (४८) यजुर्वेद – २३३