यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 235, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वार्ध अठारहवां अध्याय दिवो मूर्द्धासि पृथिव्या नाभिरूर्गपामोषधीनाम्. विश्वायुः शर्म सप्रथा नमस्पथे.. (५४) हे अग्नि! आप स्वर्गलोक की मूर्धा, पृथ्वीलोक की नाभि, ओषधियों का सारतत्त्व व विश्व का जीवन (आयु) हैं. आप सुखदाता व समस्त पथ में व्याप्त हैं. आप पथप्रदर्शक हैं. हे अग्नि! आप को नमन. (५४) विश्वस्य मूर्धन्नधितिष्ठसि श्रितः समुद्रे ते हृदयमप्स्वायुरपो दतोदधिं भिन्त. दिवस्पर्जन्यादन्तरिक्षात्पृथिव्यास्ततो नो वृष्ट्याव.. (५५) हे अग्नि! आप विश्व की मूर्धा पर अधिष्ठित हैं. आप का हृदय समुद्र में आश्रित है. आप जल में व्याप्त हैं. आप समुद्र का भेदन कर के जल निकालिए. आप स्वर्गलोक व बादलों से हमारे लिए वर्षा कीजिए. आप अंतरिक्ष व पृथ्वी से हमारे लिए वर्षा कीजिए. (५५) इष्टो यज्ञो भृगुभिराशीर्दा वसुभिः. तस्य न ऽ इष्टस्य प्रीतस्य द्रविणेहागमेः.. (५६) धन इष्ट है. यज्ञ में हम बारबार आप की इच्छा करते हैं. आप हमें भरपूर धनों से आशीर्वाद दीजिए. हम धन से प्रीति रखते हैं. हम धन के लिए उत्तम रीति से यज्ञ संपादित करते हैं. (५६) इष्टो अग्निर्राहुतः पिपर्तु न ऽ इष्ट १४ हविः. स्वगेदं देवेभ्यो नमः.. (५७) हे अग्नि! आप इष्ट हैं. हम आप का आह्वान करते हैं. हम हवि से तृप्त करते हैं. आप स्वयं प्रकाश व गमनशील हैं. आप हमारी हवि देवों तक पहुंचाने की कृपा करें. (५७) यदाकूतात्समुसुस्रोद्धृदो वा मनसो वा सम्भृतं चक्षुषो वा. तदनु प्रेत सुकृतामु लोकं यत्र ऋषयो जग्मुः प्रथमजाः पुराणाः.. (५८) हे यजमानो! ज्ञान श्रेष्ठ बुद्धि के स्रोत से उत्पन्न होता है. मानस से निकलता है. चक्षुओं से स्रवित होता है. हम उस का और श्रेष्ठ कर्मों का अनुकरण करें. हम उस लोक को प्राप्त करें, जहां पूर्व में उत्पन्न पुरातन ऋषि पहुंच चुके हैं. (५८) एतं १४ सधस्थ परि ते ददामि यमावहाच्छेवधिं जातवेदाः. अन्वागन्ता यज्ञपतिर्वो अत्र त १४ स्म जानीत परमे व्योमन्.. (५९) हे परम शक्ति! चारों ओर से यज्ञफल हम आप को भेंट करते हैं. अग्नि यजमान को जो फल भेंट करते हैं, वह हम आप के लिए अर्पित करते हैं, अंततोगत्वा यजमान परम व्योम में आता है. उस की गति को आप जानिए. (५९) एतं जानीथ परमे व्योमन् देवाः सधस्था विद रूपमस्य. यदागच्छात्पथिभिर्देवयानैरिष्टापूर्ते कृणवाथाविरस्मै.. (६०) यजुर्वेद - २३५