यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 248, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वार्ध उन्नीसवां अध्याय हे सोम! आप पूर्वजों के साथ हो कर स्वर्गलोक के सुख विस्तृत कीजिए. आप पूर्वजों के साथ हो कर पृथ्वीलोक के सुख विस्तृत कीजिए. हम आप के लिए हवि का विधान करते हैं. आप और हम भी धनपति हों. ( ५४ ) बर्हिषदः पितर ऽ ऊर्त्यर्वागिमा वो हव्या चकृमा जुषध्वम्. त ऽ आ गतावसा शन्तमेनाथा नः शं योररपो दधात.. (५५) हे पितरगण! आप कुश के आसन पर विराजते हैं. हम आप के लिए ऊंचेऊंचे स्वर में स्तुति गाते हैं. हम आप के लिए हवि समर्पित करते हैं. आप प्रसन्नता से इस हवि को ग्रहण करने व रक्षा साधनों से इस यज्ञ में पधारने की कृपा कीजिए. आप हमारे लिए सुख धारिए. ( ५५ ) आहं पितॄन्सुविदत्राँ २ अवित्सि नपातं च विक्रमणं च विष्णोः. बर्हिषदो ये स्वधया सुतस्य भजन्त पित्वस्त ऽ इहागमिष्ठाः.. (५६) आप श्रेष्ठ ज्ञाता हैं. आप पितरों को अच्छी तरह जानिए. आप संसार के गतिमान चक्र को समझें. जो पितर कुश के आसन पर विराजित हैं, जो पितर स्वधामय सोमरस पीते हैं, वे पितरगण यहां आने की कृपा करें. ( ५६ ) उपहूताः पितरः सोम्यासो बर्हिष्येषु निधिषु प्रियेषु. त ऽ आ गमन्तु त ऽ इह श्रुवन्त्वधि ब्रुवन्तु तेवन्त्वस्मान्.. (५७) हम पितरों व सोमरस के इच्छुक पितरों का आह्वान करते हैं. हम कुश के आसन पर विराजित पितरों का आह्वान करते हैं. पितरगण हमारे प्रिय वचनों व हमारी बोली हुई स्तुतियों को सुनने और हमारी रक्षा करने की कृपा करें. ( ५७ ) आ यन्तु नः पितरः सोम्यासोऽग्निष्वात्ताः पथिभिर्देवयानैः. अस्मिन् यज्ञे स्वधया मदन्तोधि ब्रुवन्तु तेवन्त्वस्मान्.. (५८) हमारे पितर सोम के समान सौम्य हैं. अग्नि जैसे तेजस्वी हैं. पितरगण देवों के लिए उपयुक्त मार्गों से इस यज्ञ में पधारने की कृपा करें. इस यज्ञ में स्वधा से आनंदित हों. हमारे प्रति उपदेश देने व हमारी रक्षा करने की कृपा करें. ( ५८ ) अग्निष्वात्ताः पितर ऽ एह गच्छत सदःसदः सदत सुप्रणीतयः. अत्ता हवी ᳪ षि प्रयतानि बर्हिष्यथा रयि ᳪ सर्ववीरं दधातन.. (५९) पितरगण अग्नि के समान तेजस्वी हैं. वे यहां पधारें. यज्ञ सदन में विराजने की कृपा करें. कुश के आसन पर विराजिए. पितर हम यजमान के लिए धन व श्रेष्ठ वीर धारने की कृपा करें. ( ५९ ) ये ऽ अग्निष्वात्ता ये ऽ अनग्निष्वात्ता मध्ये दिवः स्वधया मादयन्ते. तेभ्यः स्वराडसुनीतिमेतां यथावशं तन्वं कल्पयाति.. (६०) २४८ - यजुर्वेद