भारतकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 251, कुल 421 में से

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पूर्वार्ध उन्नीसवां अध्याय अ॒द्भ्यः क्षीरं॒ व्यपिबत् क्रुङ्ङाङ्गिर॒सो धि॒या. ऋ॒तेन॑ स॒त्यमि॑न्द्रि॒यं विपान॒ ᳵ शु॒क्रमन्ध॑स॒ ऽ इन्द्र॑स्येन्द्रि॒यमि॒दं पयो॒मृतं॒ मधु॑.. (७३) प्राण रूपी हंस बुद्धि से जल मिश्रित दूध में से दूध पीता है. ऋत से सत्य की प्राप्ति कराता है. यह इंद्रियों में सामर्थ्य प्रदान कराता है. यह हमें दूध व मधुर पदार्थ की प्राप्ति कराता है. (७३) सोम॑म॒द्भ्यो व्यपिबच्छन्द॑सा ह॒ ᳵ सः शु॒चिषत्. ऋ॒तेन॑ स॒त्यमि॑न्द्रि॒यं विपान॒ ᳵ शु॒क्रमन्ध॑स॒ ऽ इन्द्र॑स्येन्द्रि॒यमि॒दं पयो॒मृतं॒ मधु॑.. (७४) आदित्य देव सोम को जलों से पृथक् कर के पीते हैं. ऋत से सत्य की प्राप्ति कराते हैं. यह इंद्रियों में सामर्थ्य प्रदान कराते हैं. यह हमें दूध व मधुर पदार्थ की प्राप्ति कराते हैं. (७४) अन्ना॒त्परिस्रुतो॒ रसं॒ ब्रह्म॑णा॒ व्यपिबत् क्ष॒त्रं पयः॒ सोमं॑ प्रजाप॑तिः. ऋ॒तेन॑ स॒त्यमि॑न्द्रि॒यं विपान॒ ᳵ शु॒क्रमन्ध॑स॒ ऽ इन्द्र॑स्येन्द्रि॒यमि॒दं पयो॒मृतं॒ मधु॑.. (७५) ब्राह्मणों के साथ प्रजापति निस्सृत अन्न के रस से सोम रूपी दूध को अलग कर के पीते हैं. ऋत से सत्य की प्राप्ति कराते हैं. यह इंद्रियों में सामर्थ्य प्रदान कराते हैं. यह हमें दूध, अमृत व मधुर पदार्थ की प्राप्ति कराते हैं. (७५) रेतो॒ मूत्रं॑ वि॒जहा॑ति॒ योनिं॑ प्रवि॒शदि॑न्द्रि॒यम्. गर्भो॒ जरायु॒णावृ॑त॒ ऽ उल्बं॑ जहाति॒ जन्म॑ना. ऋ॒तेन॑ स॒त्यमि॑न्द्रि॒यं विपान॒ ᳵ शु॒क्रमन्ध॑स॒ ऽ इन्द्र॑स्येन्द्रि॒यमि॒दं पयो॒मृतं॒ मधु॑.. (७६) एक ही मार्ग मूत्र छोड़ता है और वही योनि इंद्रिय में प्रवेश कर के वीर्य छोड़ता है. गर्भ जरायु से आवृत हो कर जन्म के साथ ही उस को भेद कर छोड़ देता है. ऋत से सत्य की प्राप्ति कराता है. यह इंद्रियों में सामर्थ्य प्रदान कराता है. यह हमें दूध, अमृत की प्राप्ति कराता है. यह हमें मधुर पदार्थ की प्राप्ति कराता है. (७६) दृष्ट्वा रू॒पे व्याक॑रोत्स॒त्यानृ॒ते प्र॒जाप॑तिः. अश्र॑द्धामनृ॒तेऽद॑धाच्छ्र॒द्धा ᳵ स॒त्ये प्र॒जाप॑तिः. ऋ॒तेन॑ स॒त्यमि॑न्द्रि॒यं विपान॒ ᳵ शु॒क्रमन्ध॑स॒ ऽ इन्द्र॑स्येन्द्रि॒यमि॒दं पयो॒मृतं॒ मधु॑.. (७७) प्रजापति ने सत्य और असत्य दोनों को अलगअलग रूपों में स्थापित किया प्रजापति ने असत्य को अश्रद्धा व सत्य को श्रद्धा के रूप में स्थापित किया. ऋत से सत्य की प्राप्ति कराता है. यह इंद्रियों में सामर्थ्य प्रदान कराता है. यह हमें दूध, अमृत व मधुर पदार्थ की प्राप्ति कराता है. (७७) वे॒देन॑ रू॒पे व्यपिबत् सु॒तासु॒तौ प्र॒जाप॑तिः. ऋ॒तेन॑ स॒त्यमि॑न्द्रि॒यं विपान॒ ᳵ शु॒क्रमन्ध॑स॒ ऽ इन्द्र॑स्येन्द्रि॒यमि॒दं पयो॒मृतं॒ मधु॑.. (७८) प्रजापति ने वेदों से ग्राह्य और अग्राह्य रूप को पीया. ऋत सत्य की प्राप्ति यजुर्वेद - २५१